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पलामू हिरासत मौत का मामला: मेडिकल सर्टिफिकेट में हेरफेर एवं पुलिस कस्टडी में बर्बरता का खुलासा

आयुष चौहान Ranchi: झारखंड में पुलिसिया बर्बरता और मानवाधिकारों के हनन का एक बेहद चौंकाने वाला मामले में झारखंड हाई कोर्ट ने...

आयुष चौहान

Ranchi: झारखंड में पुलिसिया बर्बरता और मानवाधिकारों के हनन का एक बेहद चौंकाने वाला मामले में झारखंड हाई कोर्ट ने सख्त आदेश जारी किया है. जिसमें पुलिस कस्टडी में बर्बरता के बाद मौत एवं पुलिस एवं स्वास्थ्य अधिकारियों के द्वारा झूठे मेडिकल रिपोर्ट बनाने से जुड़ा मामला दरअसल पलामू जिले में पुलिस कस्टडी में प्रताड़ना (कस्टोडियल टॉर्चर) के कारण ‘महफूज अहमद’ नामक युवक की मौत के मामले में अदालत ने सख्त रुख अपनाया है. मृतक के परिजनों द्वारा दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान मेडिकल सर्टिफिकेट में गंभीर हेरफेर और विरोधाभासों की परतें खुली हैं.

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पढ़िए अदालत का विस्तृत आदेश- यह याचिका सुप्रीम कोर्ट द्वारा डी.के. बासु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) मामले में गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर जारी किए गए ऐतिहासिक दिशानिर्देशों के जानबूझकर किए गए उल्लंघन के खिलाफ दायर की गई है. जिस पर झारखंड हाई कोर्ट के न्यायाधीश सुजीत नारायण प्रसाद न्यायाधीश अनुभा रावत चौधरी की खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया है.

परिजनों का आरोप: 5 दिनों का अवैध कस्टोडियल टॉर्चर और SP की संलिप्तता

याचिकाकर्ता—जो मृतक महफूज अहमद की मां, पिता और भाई हैं—के अनुसार, घटना की शुरुआत 1 मार्च 2025 की शाम करीब 5:30 बजे हुई. नवाबाजार थाने के एएसआई सुधीर कुमार और अन्य पुलिसकर्मियों ने महफूज को उसके नर्सिंग होम से बेरहमी से घसीटते हुए पुलिस जीप में डाल दिया. जब मकान मालिक विशुन देव उरांव ने इसका विरोध किया, तो पुलिस उन्हें भी अपने साथ ले गई. परिजनों का आरोप है कि महफूज को पांच दिनों तक अवैध हिरासत में रखकर थाने के लॉकअप में निर्वस्त्र कर उल्टा लटकाया गया और बेरहमी से पीटा गया. याचिका में पलामू की तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (SP) रेश्मा रमेशन पर सीधे और गंभीर आरोप लगाए गए हैं. आरोप के अनुसार, 3 मार्च 2025 की रात महफूज को एसपी आवास ले जाया गया, जहां खुद महिला एसपी ने उसके सीने पर वार किया, लाठियों से पीटा और उसके निजी अंगों को बुरी तरह कुचलने के बाद उसमें पेट्रोल डाल दिया. परिजनों के अनुसार, जब महफूज की हालत मरणासन्न हो गई, तो पुलिस ने अपनी चमड़ी बचाने के लिए 6 मार्च 2025 को तड़के 5:20 बजे पांकी थाने में एक मनगढ़ंत और फर्जी एफआईआर (पांकी पी.एस. केस नंबर 25/2025) दर्ज की और आनन-फानन में उसे कोर्ट में पेश किया। इलाज के दौरान राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS), रांची में 23 मार्च 2025 को महफूज ने दम तोड़ दिया.

अदालत में खुलासे: फिटनेस सर्टिफिकेटपर बड़ा खेल

हाईकोर्ट के खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और अस्पताल प्रशासन के दावों की धज्जियां उड़ गईं. पुलिस ने 6 मार्च 2025 को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM), पलामू के समक्ष महफूज को पेश करते हुए एक ‘मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट’ दाखिल किया था, जिसमें उसे कस्टडी के लिए पूरी तरह ‘स्वस्थ’ (Medically Fit) बताया गया था. इसी आधार पर सीजेएम ने उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया था. हालांकि, हाईकोर्ट की पैनी नजर से विरोधाभास छिप नहीं सके. रिम्स (RIMS) के बेड टिकट से पता चला कि महफूज को मेदिनी राय मेडिकल कॉलेज अस्पताल (MMCH), पलामू से 4 मार्च 2025 को ही रिम्स रेफर कर दिया गया था. अदालत ने सवाल उठाया कि अगर आरोपी 4 मार्च को ही रेफर हो चुका था, तो पुलिस ने 6 मार्च को उसे सीजेएम के सामने शारीरिक रूप से कैसे पेश किया और 6 मार्च का फिटनेस सर्टिफिकेट कैसे बनवाया?

हाईकोर्ट का कड़ा रुख

अदालत ने विसंगतियों को देखते हुए MMCH, पलामू के मेडिकल सुपरिटेंडेंट को मूल एडमिशन रजिस्टर के साथ व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में तलब किया था.

डॉक्टर का कबूलनामा: फोटोकॉपी पर दी गई दवाएं, मूल प्रति गायब

8 मई 2026 को हुई सुनवाई के दौरान मामले ने नया मोड़ ले लिया. कोर्ट में मौजूद MMCH के डिप्टी सुपरिटेंडेंट डॉ. विजय कुमार सिंह ने खुली अदालत में राज्य के वकील की मौजूदगी में स्वीकार किया कि पुलिस ने उन्हें फिटनेस सर्टिफिकेट की मूल प्रति (Original) दी ही नहीं थी. डॉक्टर ने बताया कि जांच अधिकारी (IO) ने उनसे कहा था कि मूल फिटनेस सर्टिफिकेट खो गया है, इसलिए उन्होंने केवल फोटोकॉपी पर ही अपनी रिपोर्ट दी. आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि जिस मूल पर्चे पर महफूज को ‘फिट’ घोषित किया गया था, उसी की फोटोकॉपी पर बाद में हाथ से लिखा गया कि एक्स-रे रिपोर्ट में उसके बाएं हाथ की दोनों हड्डियां (Radius और Ulna) टूटी हुई पाई गई हैं और उसे दवाइयां लिखी गईं. अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि रिमांड हासिल करने के लिए अदालत के साथ धोखाधड़ी की गई और बाद में डॉक्टर से फोटोकॉपी प्रमाणित कराई गई.

पुलिस का पलटवार: मृतक को बताया उग्रवादी संगठन का सदस्य

दूसरी ओर, राज्य सरकार और पुलिस महानिदेशक की ओर से दाखिल कारण बताओ (Show Cause) नोटिस में इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया गया है. पुलिस का दावा है कि मृतक महफूज अहमद कोई सीधा-साधा कंपाउंडर नहीं, बल्कि प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन ‘तृतीय सम्मेलन प्रस्तुति कमेटी’ (TSPC) का सक्रिय सदस्य था. पुलिस के मुताबिक, महफूज को 6 मार्च 2025 को तड़के 2:30 बजे पोर्सम गांव में एक गुप्त सूचना के आधार पर छापेमारी कर गिरफ्तार किया गया था. उसके पास से दो देसी कट्टे, एक प्रतिबंधित 7.65 एमएम पिस्टल, जिंदा कारतूस और चोरी की दो मोटरसाइकिलें बरामद हुई थीं. पुलिस ने सीडीआर (CDR) का हवाला देते हुए कहा कि महफूज 1 और 2 मार्च को पूरी तरह आजाद था और उग्रवादी कमांडर ‘गौतम जी’ के साथ लगातार व्हाट्सएप और कॉल पर संपर्क में था. हालांकि, पिता की शुरुआती शिकायत पर कार्रवाई करते हुए नवाबाजार के थाना प्रभारी चिंटू कुमार को निलंबित कर विभागीय जांच शुरू कर दी गई है थी.

दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत में फैसला सुरक्षित रख लिया था. हालांकि अदालत की सुनवाई के दौरान ही फर्जी मेडिकल रिपोर्ट पर डिप्टी सुपरिटेंडेंट का कबूल नामा और जांच अधिकारियों के बयान में विरोधाभास से यह साफ जाहिर हो चुका था कि मामला विरासत में उतरना से जुड़ा है. जिसके वजह से युवक की मौत हुई अदालत में इसे गंभीर मानते हुए और पुलिसिया बर्बरता को देखते हुए प्रधान जिला न्यायाधीश पलामू एवं डाल्टनगंज कोई दिशा निर्देश दिया है कि इस पूरे मामले की जांच मजिस्ट्रेट की अगुवाई में की जाए. इस पूरे मामले में प्रार्थी का पक्ष झारखंड हाई कोर्ट के अधिवक्ता शादाब इकबाल एवं आयुष ने मजबूती से रखा जिस पर अदालत में कड़े आदेश जारी किए और यह माना कि इसमें पुलिस अधिकारियों से लेकर स्वास्थ्य अधिकारियों की संवेदनहीनता और बर्बरता साफ जाहिर होती है. न्यायिक जांच के बाद अदालत के समक्ष रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी. वहीं रिपोर्ट के अनुसार संलिप्त पुलिस एवं स्वास्थ्य अधिकारी पर कार्रवाई की जा सकेगी.

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