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संकटमोचक ही बने संकट, भूपेश बघेल और अजय शर्मा के भरोसे बैठी झारखंड कांग्रेस चारों खाने हुई चित

Ranchi: झारखंड राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार ने एक बार फिर आलाकमान के चुनावी मैनेजमेंट की कलई खोलकर रख दी...

Bhupesh Baghel

Ranchi: झारखंड राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार ने एक बार फिर आलाकमान के चुनावी मैनेजमेंट की कलई खोलकर रख दी है. कागजी गणित पक्ष में होने के बावजूद पार्टी को मिली इस शिकस्त के पीछे कोई बाहरी साजिश नहीं, बल्कि खुद कांग्रेस के दिग्गज क्राइसिस मैनेजरों की रणनीति का अभाव रहा. चुनावी नैया पार लगाने के लिए पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और सीनियर नेता अजय शर्मा को सीनियर ऑब्जर्वर बनाकर तैनात किया था, लेकिन इनका ट्रैक रिकॉर्ड एक बार फिर दावे अनेक, चुनावी फायदे शून्य वाला साबित हुआ.

भूपेश बघेल: दावों की हकीकत

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को कांग्रेस आलाकमान हर मुश्किल राज्य में संकटमोचक बनाकर भेजता रहा है. चाहे 2021 का असम विधानसभा चुनाव हो, 2022 का उत्तर प्रदेश चुनाव, या फिर हालिया 2026 के चुनावों की तैयारियां हों बघेल को हमेशा अहम जिम्मेदारियां मिलीं. लेकिन उनकी इन कोशिशों से पार्टी को शायद ही कभी कोई चुनावी फायदा मिला हो. झारखंड में प्रणव झा की जीत पक्की करने का जिम्मा भी बघेल के कंधों पर था. लेकिन सूत्रों का कहना है कि संकट के समय मोर्चे पर डटने के बजाय बघेल का दौरा महज सियासी टूरिज्म बनकर रह गया. वे 6 जून से 8 जून के बीच सिर्फ दो दिन रांची में रहे. इस बेहद संवेदनशील चुनाव के दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से सिर्फ एक बार मुलाकात की. इसके बाद, जब चुनाव मैनेजमेंट के सबसे महत्वपूर्ण और आखिरी चरण की देखरेख की सबसे ज्यादा जरूरत थी, बघेल वापस रांची लौटकर ही नहीं आए.

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अजय शर्मा: हरियाणा की गलती से सबक न लेने की जिद

भूपेश बघेल के साथ दूसरे ऑब्जर्वर अजय शर्मा थे, जिनका खुद का ट्रैक रिकॉर्ड हाल के दिनों में बेहद खराब रहा है. हरियाणा में राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के मैनेजमेंट की कमान अजय शर्मा के ही हाथों में थी. वहां पूरा गणित कांग्रेस उम्मीदवार अजय माकन के पक्ष में था, लेकिन शर्मा के मैनेजमेंट का नतीजा यह हुआ कि माकन को निर्दलीय उम्मीदवार कार्तिकेय शर्मा से बेहद चौंकाने वाली हार झेलनी पड़ी. हरियाणा की रणनीतिक विफलता के बाद भी कांग्रेस आलाकमान ने अजय शर्मा पर भरोसा जताया और उन्हें झारखंड भेज दिया. नतीजा वही रहा जो हरियाणा में हुआ था.पार्टी के पास नंबर होने के बावजूद कांग्रेस जमीनी घेराबंदी करने में पूरी तरह नाकाम रही और प्रणव झा रेस से बाहर हो गए.

आलाकमान की सुस्ती

इस हार की पटकथा में सिर्फ ऑब्जर्वर ही दोषी नहीं हैं, बल्कि दिल्ली में बैठे नेतृत्व की बेरुखी भी बराबर की जिम्मेदार है. एआईसीसी जनरल सेक्रेटरी केसी  वेणुगोपाल ने झारखंड के इस बेहद महत्वपूर्ण राज्यसभा चुनाव में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली. संगठन के सबसे बड़े पद पर बैठे नेता की यह रहस्यमयी चुप्पी और एक्टिव देखरेख की कमी ही आखिरकार हार की सबसे बड़ी वजह बनी. इसके अलावा, गठबंधन सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल की कुछ शिकायतें थीं, जिन्हें समय रहते दूर किया जा सकता था. राजनीति के जानकारों का मानना है कि अगर कांग्रेस आलाकमान ने थोड़ी भी राजनीतिक इच्छाशक्ति और तेजी दिखाई होती, तो आरजेडी को आसानी से मनाया जा सकता था.

गठबंधन संभालने में फेल कांग्रेस

झारखंड के इस घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि कांग्रेस आज भी सहयोगियों को साथ लेकर चलने और अपने आंतरिक संकटों को मैनेज करने में पूरी तरह अक्षम साबित हो रही है. कांग्रेस के लिए यह चुनाव एक चेतावनी भी है कि सिर्फ बड़े चेहरों को ऑब्जर्वर बना देने से चुनाव नहीं जीते जाते, उसके लिए जमीन पर पसीना बहाना पड़ता है.

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