Ranchi: झारखंड की सियासत में राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने वह भूचाल ला दिया है, जिसकी पटकथा पर्दे के पीछे काफी समय से लिखी जा रही थी. कांग्रेस और सत्ताधारी गठबंधन के बड़े-बड़े दावों की हवा निकालते हुए निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी ने न सिर्फ जीत दर्ज की, बल्कि गठबंधन के भीतर की उस गहरी दरार को भी उजागर कर दिया, जिसे ऑल इज वेल के नारों से ढकने की कोशिश की जा रही थी. चौंकाने वाली बात यह है कि चुनाव से ठीक पहले लगातार दो दिनों तक गठबंधन के विधायकों को मॉक पोल कराकर वोटिंग की ट्रेनिंग दी गई थी. उस मॉक पोल में सभी वोट वैध पाए गए थे, लेकिन जब परीक्षा की असली घड़ी आई, तो वह सारी ट्रेनिंग धरी की धरी रह गई. गठबंधन के सिपहसालार अपनी ही रणनीति के चक्रव्यूह में फंसकर ढेर हो गए.
क्रॉस वोटिंग और अमान्य वोटों का खेल
चुनावी नतीजों के आंकड़ों ने साफ कर दिया है, कि गठबंधन के कुछ विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर सीधे तौर पर कांग्रेस उम्मीदवार के खिलाफ जाकर मतदान किया. इतना ही नहीं, खेल को और गंदा बनाने के लिए 3 वोटों को जानबूझकर अमान्य (रिजेक्ट) घोषित करा दिया गया. इस भीतरघात और क्रॉस वोटिंग के बावजूद नाथवानी बाजी मारने में सफल रहे. ऐसे में अब सवाल यह उठ रहा है कि जो विधायक दो दिन पहले तक एकजुटता की कसमें खा रहे थे, उन्होंने ऐन वक्त पर किसके इशारे पर कांग्रेस उम्मीदवार की पीठ में खंजर घोंपा? यह महज एक चुनावी हार नहीं, बल्कि गठबंधन की विश्वसनीयता का सरेआम कत्ल है.
झारखंड की राजनीति पर दूरगामी असर
इस चुनाव के नतीजे झारखंड की भविष्य की राजनीति की दिशा और दशा तय करने वाले साबित होंगे. इस हार ने साबित कर दिया है कि गठबंधन के क्षत्रपों का अपने ही विधायकों पर से नियंत्रण पूरी तरह खो चुका है. जेएमएम, कांग्रेस और सहयोगियों के बीच अब अविश्वास की खाई इतनी गहरी हो चुकी है, जिसे पाटना नामुमकिन होगा. आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में इसका सीधा असर टिकट बंटवारे और जमीनी तालमेल पर दिखेगा. इस क्रॉस वोटिंग ने विरोधी खेमे को यह संदेश दे दिया है, कि सत्ताधारी किला अंदर से पूरी तरह खोखला हो चुका है और इसे कभी भी ढहाया जा सकता है.
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