रथ की डोर, प्रभु की ओर: भक्ति के रंग में डूबी रांची, जगन्नाथपुर मंदिर से निकली आस्था की भव्य यात्रा, सदियों पुरानी परंपरा का साक्षी बना मौसीबाड़ी का पावन सफर, CM और राज्यपाल ने विधिविधान से की पूजा अर्चना

Ravi Bharti Ranchi: झारखंड की राजधानी रांची का वातावरण श्रद्धा और उल्लास के अद्भुत संगम से सराबोर है. 335 वर्षों से चली...

CM और राज्यपाल ने विधिविधान से की पूजा अर्चना
CM और राज्यपाल ने विधिविधान से की पूजा अर्चना

Ravi Bharti

Ranchi: झारखंड की राजधानी रांची का वातावरण श्रद्धा और उल्लास के अद्भुत संगम से सराबोर है. 335 वर्षों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन करते हुए, गुरुवार को ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर से महाप्रभु जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा निकाली गई. जैसे ही भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और अग्रज बलभद्र ने अपने भव्य रथ पर सवार होकर कदम बढ़ाए, समूची राजधानी जय जगन्नाथ के उद्घोष से गूंज उठी. यह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि आस्था का वह महासागर है जिसमें गोते लगाने के लिए लाखों भक्त आतुर दिखाई दिए. आज जब रांची में रथ आगे बढ़ रहा था, तो ऐसा लग रहा था मानो काल स्वयं अपनी गति धीमी कर प्रभु की भक्ति के इस दृश्य को निहार रहा हो. 335 वर्षों से जो ज्योति प्रज्ज्वलित है, वह आज भी उतनी ही दिव्य है. भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र का यह प्रवास भक्तों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संचार करे, इसी कामना के साथ रांची का जन-मानस प्रभु के स्वागत में नतमस्तक है.

अध्यात्म और श्रद्धा का मंगलमय आरंभ

भोर की पहली किरण के साथ ही जगन्नाथपुर मंदिर परिसर में भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा. सुबह 4 बजे हुई विशेष पूजा और महाआरती के साथ ही इस दस दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान का श्रीगणेश हुआ. मंदिर के गर्भगृह से शुरू हुआ यह भक्ति का कारवां विष्णु सहस्त्रनाम के पावन पाठ से और अधिक ऊर्जावान हो गया. राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी इस अनुष्ठान में पूर्ण निष्ठा के साथ भाग लिया.जब भगवान के विग्रह को रथ पर विराजमान किया गया, तो भक्तों की आंखों में श्रद्धा के आंसू और चेहरे पर मुस्कान थी. राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने जब श्रद्धालुओं के साथ मिलकर भगवान का जयकारा लगाया और रथ की डोर थामी, तो वहां उपस्थित हर भक्त को लगा मानो साक्षात प्रभु ने उनके हृदय में वास कर लिया हो.

335 वर्षों की अटूट विरासत

रांची की जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी उस विरासत का प्रतीक है जिसने पीढ़ियों को जोड़ा है. 335 वर्षों से यह परंपरा अनवरत जारी है, जो यह सिद्ध करती है कि समय के बदलने के साथ रांची का स्वरूप तो बदला है, लेकिन भगवान के प्रति यहाँ के लोगों की आस्था की नींव आज भी उतनी ही गहरी और अडिग है. रथ यात्रा के दौरान भक्त केवल रथ को खींचने की कोशिश नहीं कर रहे थे, बल्कि वे अपने भीतर के अहं को मिटाकर प्रभु की सेवा में स्वयं को समर्पित कर रहे थे.

मौसीबाड़ी की ओर प्रभु का प्रवास

पौराणिक कथाओं और लोक-विश्वास के अनुसार, भगवान जगन्नाथ हर वर्ष अपनी मौसी के घर यानी मौसीबारी जाते हैं. यह प्रवास केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत है. भक्त मानते हैं कि प्रभु जब मौसीबाड़ी जाते हैं, तो वे आम भक्तों के और अधिक करीब हो जाते हैं. नौ दिनों तक भगवान अपनी मौसी के घर में विभिन्न प्रकार के भोग-प्रसाद ग्रहण करेंगे और भक्तों को दर्शन देंगे.

रथ की डोर छूने के लिए उमड़े भक्त

रथ की डोर को छूने के लिए भक्तों की आपाधापी को देखकर यह प्रतीत हो रहा था कि हर कोई उस आशीर्वाद को अपने जीवन में उतार लेना चाहता है, जिसके बारे में कहा गया है कि रथ को खींचने मात्र से सौ यज्ञों के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है.यह विश्वास ही है जो भीड़ के बावजूद भक्तों के उत्साह में रत्ती भर भी कमी नहीं आने देता.

एक आध्यात्मिक उत्सव और आस्था का जन-ज्वार

इस रथ यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता इसका जन-सहभागिता वाला स्वरूप है. यहां न कोई बड़ा है, न कोई छोटा. सब केवल जगन्नाथ का भक्त हैं. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार की उपस्थिति ने इस उत्सव को और अधिक गरिमा प्रदान की, लेकिन मुख्य आकर्षण तो वह आम नागरिक था जो मील चलकर अपने आराध्य के दर्शन और रथ के स्पर्श के लिए आया था. दस दिनों तक चलने वाले इस जगन्नाथपुर मेले में अब उत्सव का माहौल और बढ़ेगा. रंग-बिरंगी दुकानें, मधुर भजनों की गूंज और सर्वत्र व्याप्त भक्तिमय वातावरण रांची को एक मिनी पुरी के रूप में स्थापित कर देता है. भक्त अब बहुदा रथ यात्रा की प्रतीक्षा करेंगे, जब भगवान वापस अपने मुख्य मंदिर लौटेंगे और गर्भ गृह में विराजमान होंगे.

सबरी की तरह प्रतीक्षा, निस्वार्थ समर्पण

यह रथ यात्रा सिखाती है कि प्रभु के लिए कोई दूरी बड़ी नहीं है. जो भक्त निस्वार्थ भाव से रथ की डोर थामता है, वास्तव में वह अपने जीवन की डोर प्रभु के हाथों में सौंप देता है. यह यात्रा अहंकार के विसर्जन और समर्पण के उदय का उत्सव है. रांची की धरती पर गूंजता जय जगन्नाथ का स्वर केवल ध्वनि नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक तरंग है जो मनुष्य को भौतिक चकाचौंध से ऊपर उठाकर आत्मिक शांति की ओर ले जाती है.

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