Ranchi: झारखंड और पश्चिम बंगाल पुलिस के लिए सिरदर्द बनी रही हार्डकोर महिला नक्सली पुष्पा महतो उर्फ शकुंतला महतो उर्फ परी उर्फ वर्षा ने आखिरकार हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है. बुधवार को पुष्पा ने कोलकाता के लालबाजार स्थित पुलिस मुख्यालय में पुलिस आयुक्त अजय नंदा के समक्ष अपने हथियार के साथ आत्मसमर्पण कर दिया. वह कुख्यात माओवादी नेता असीम मंडल के दस्ते की एक सक्रिय और महत्वपूर्ण सदस्य थी. झारखंड सरकार की इनामी सूची और वांटेड पोस्टर में शामिल पुष्पा महतो पर कई संगीन मामले दर्ज हैं. दो दशक से भी अधिक समय तक जंगलों में बंदूक के दम पर खौफ पैदा करने वाली पुष्पा अब एक सामान्य नागरिक की तरह जीवन जीना चाहती है.
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11 साल की उम्र में थामा था हथियार, सांस्कृतिक इकाई से बनीं सशस्त्र दस्ता सदस्य
मूल रूप से पश्चिम बंगाल के बेलपहाड़ी थाना क्षेत्र के मेछुआ गांव की रहने वाली पुष्पा महतो एक साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखती है. वह अपने तीन बहनों और एक भाई में सबसे बड़ी है. परिवार के अनुसार, पुष्पा बेहद कम उम्र (महज 11 वर्ष) में अपने चाचा युधिष्ठिर महतो उर्फ अर्जुन के प्रभाव में आ गई थी. अर्जुन उस इलाके का एक चर्चित माओवादी नेता था.
सांस्कृतिक से सशस्त्र विंग का सफर
शुरुआत में पुष्पा संगठन के सांस्कृतिक संगठन (चेतना नाट्य मंच) से जुड़ी और गांवों में प्रचार-प्रसार का काम करने लगी, लेकिन धीरे-धीरे वह हथियारों की ट्रेनिंग लेकर माओवादियों के मुख्य सशस्त्र दस्ते की एक खूंखार सदस्य बन गई.
सांसद सुनील महतो हत्याकांड और बुरूडीह लैंडमाइन ब्लास्ट में थी शामिल
– साल 2005 में पुष्पा महतो बंगाल की सीमा पार कर झारखंड के बीहड़ों में सक्रिय हुई. उसने घाटशिला, गालूडीह, धालभूमगढ़, चाकुलिया और एमजीएम थाना क्षेत्रों में कई बड़ी वारदातों को अंजाम दिया. उसके खिलाफ दर्ज मुख्य मामलों में ये शामिल हैं.
– घाटशिला के बाघुड़िया में हुए झामुमो सांसद सुनील महतो की सनसनीखेज हत्या में पुष्पा की संलिप्तता थी.
– बुरूडीह में लैंडमाइन ब्लास्ट कर 11 पुलिस जवानों को उड़ाने की वीभत्स घटना में भी वह नामजद आरोपी है.
– इसके अलावा देशद्रोह, हत्या, और लेवी वसूलने जैसे दर्जनों मामले घाटशिला व अन्य थानों में दर्ज हैं. वह सारंडा के घने जंगलों में भी सक्रिय रही.
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व्यक्तिगत जीवन में झेले कई आघात: पति और चाचा दोनों मुठभेड़ में ढेर
– पुष्पा का नक्सली जीवन व्यक्तिगत त्रासदियों से भी भरा रहा, लेकिन फिर भी वह संगठन में टिकी रही. संगठन में रहते हुए पुष्पा ने माओवादी नेता अतुल महतो से प्रेम विवाह किया था. लेकिन शादी के महज दो साल बाद ही अतुल पुलिस मुठभेड़ में मारा गया.
– साल 2012 में बेलपहाड़ी के आमाडुबी इलाके में पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में उसके चाचा युधिष्ठिर महतो (अर्जुन) भी मारे गए, जिन्होंने उसे इस रास्ते पर लाया था. इन बड़े झटकों के बाद भी वह जंगल में सक्रिय रही, लेकिन बदलते वक्त के साथ उसका माओवादी विचारधारा से मोहभंग हो गया.

माओवादी आंदोलन अब अपनी प्रासंगिकता खो चुका है
आत्मसमर्पण करने के बाद पुष्पा महतो ने राहत की सांस लेते हुए कहा- मुख्यधारा में लौटकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है. माओवादी आंदोलन अब अपनी प्रासंगिकता खो चुका है, इसका कोई भविष्य नहीं है. मैं जंगल में भटक रहे दूसरे साथियों से भी अपील करती हूं कि वे भी हिंसा का रास्ता छोड़ें, सरेंडर करें और सामान्य जीवन में लौट आएं.
दरवाजे पर चिपकते थे वारंट, अब 21 साल बाद परिवार में लौटी खुशियां
पुष्पा के आत्मसमर्पण की खबर से मेछुआ गांव में रहने वाले उसके माता-पिता और भाई-बहनों ने राहत की सांस ली है. पुष्पा के भाई अमिय महतो ने भावुक होते हुए बताया कि जब दीदी घर छोड़कर गई थीं, तब वह सिर्फ 11 साल की थीं और मैं महज 4 साल का था. उनके जाने के बाद हमारे परिवार ने बहुत परेशानियां झेलीं. झारखंड पुलिस बार-बार हमारे घर आती थी और दरवाजे पर कोर्ट का वारंट चिपका देती थी. समाज में हमें हमेशा डर के साये में जीना पड़ा. आज दीदी के लौटने से पूरा परिवार बेहद खुश है. परिवार को अब उम्मीद है कि वर्षों की दूरी, हिंसा और पुलिसिया दबिश के बाद पुष्पा के जीवन का यह नया अध्याय बंदूक और जंगल का नहीं, बल्कि समाज और परिवार के साथ का होगा.



