Hazaribagh: झारखंड राज्य सचिवालय द्वारा जारी पत्रांक 1488 दिनांक 16 जून 2026 ने राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों में जारी प्रशासनिक निर्णयों और अधिसूचनाओं को लेकर नई बहस छेड़ दी है. पत्र में स्पष्ट किया गया है कि झारखंड राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-2026 के लागू होने के बाद पुराने अधिनियमों के तहत जारी आदेशों और अधिसूचनाओं की समीक्षा कर उन्हें नए कानून के अनुरूप किया जाना आवश्यक है.
28 अप्रैल 2026 से प्रभावी है नया विश्वविद्यालय अधिनियम
राज्य सरकार द्वारा झारखंड राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-2026 को 28 अप्रैल 2026 से प्रभावी किया गया है. इसके लागू होने के साथ ही पूर्व में संचालित झारखंड राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-2000 तथा उसके तहत बनी कई प्रक्रियाओं की वैधता को लेकर सवाल उठने लगे हैं. सचिवालय के पत्र में कहा गया है कि कई विश्वविद्यालय और महाविद्यालय अब भी पुराने अधिनियम के अनुरूप कार्य कर रहे हैं तथा उसी के आधार पर आदेश और अधिसूचनाएं जारी की जा रही हैं.

विनोबा भावे विश्वविद्यालय की अधिसूचनाएं चर्चा के केंद्र में
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में हजारीबाग स्थित विनोबा भावे विश्वविद्यालय (विभावि) भी आ गया है. आरोप है कि विश्वविद्यालय में कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय और नियुक्तियां ऐसे समय में की गईं, जब नया अधिनियम प्रभावी हो चुका था. चर्चा इस बात को लेकर भी है कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा जारी अधिसूचनाएं नए अधिनियम के अनुरूप थीं या नहीं. यदि ऐसा नहीं है तो उनकी वैधता पर सवाल खड़े हो सकते हैं.

कुलसचिव को हटाने की अधिसूचना पर भी उठ सकते हैं सवाल
जानकारों का कहना है कि हाल ही में कुलसचिव डॉ. प्रणीता को हटाने संबंधी अधिसूचना को लेकर भी कानूनी बहस तेज हो सकती है. यदि यह कार्रवाई पुराने प्रावधानों के आधार पर की गई है तो उसकी समीक्षा की मांग उठ सकती है. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सचिवालय के ताजा पत्र के बाद विश्वविद्यालय में जारी कई प्रशासनिक आदेशों की वैधता को अदालत में चुनौती दी जा सकती है.
पुराने आदेशों को नए कानून के अनुरूप करने का निर्देश
सचिवालय पत्र में निर्देश दिया गया है कि 28 अप्रैल 2026 के बाद यदि कोई आदेश, अधिसूचना अथवा पत्र पुराने अधिनियम के आलोक में जारी किया गया है तो उसे निरस्त करते हुए झारखंड राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-2026 के अनुरूप पुनः जारी किया जाए. साथ ही भविष्य में सभी प्रशासनिक कार्यवाही नए अधिनियम के तहत सुनिश्चित करने को कहा गया है. राज्य सचिवालय के इस निर्देश के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन पर दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है. यदि विभिन्न नियुक्तियों, स्थानांतरणों और प्रशासनिक फैसलों की वैधता पर सवाल उठते हैं तो कई निर्णयों की पुनर्समीक्षा करनी पड़ सकती है.
शैक्षणिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज
सचिवालय के पत्र के सामने आने के बाद शैक्षणिक और प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि झारखंड विश्वविद्यालय अधिनियम-2026 की अनदेखी कर जारी की गई अधिसूचनाओं का भविष्य क्या होगा. अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार और संबंधित विश्वविद्यालय इस मामले में आगे क्या कदम उठाते हैं तथा क्या विवादित आदेशों को वापस लेकर नए अधिनियम के अनुरूप संशोधित किया जाता है.
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