Ranchi: सिविल कोर्ट रांची के न्यायायुक्त अनिल कुमार मिश्रा नंबर-1 की अदालत ने खाद्य सुरक्षा और मिलावट से जुड़े मामलों में पुलिसिया हस्तक्षेप को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM) के पुराने आदेश को सिरे से खारिज कर दिया. अदालत ने इस मामले को वापस निचली अदालत को भेजते हुए निर्देश दिया है कि कानून के स्थापित सिद्धांतों के तहत इस पर नए सिरे से सुनवाई कर उचित आदेश पारित किया जाए.
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद वर्ष 2017 से शुरू हुआ था, जो कोतवाली थाना में दर्ज प्राथमिकी (FIR) से जुड़ा है. इस मामले में शिकायतकर्ता डॉ. सुजीत कुमार कश्यप ने राजकुमारी छपारिया (74 वर्ष), बिमला देवी, बीना छपारिया, कमल कुमार छपारिया और रोमित छपारिया समेत एक ही परिवार के कुल 14 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी. पुलिस ने जांच के बाद इन सभी के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 (FSS Act) की धारा 57, 59 और 63 के तहत चार्जशीट दाखिल की थी.
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चार्जशीट के आधार पर कोर्ट ने लिया संज्ञान
मामले में चार्जशीट के आधार पर कोर्ट ने संज्ञान (Cognizance) लिया था और मामला आरोपियों के खिलाफ आरोप गठित करने के चरण में था. इस बीच, आरोपियों की ओर से उनके वकील सौरभ राज ने निचली अदालत (CJM कोर्ट) में तीन अलग-अलग डिस्चार्ज याचिकाएं दाखिल कर केस से बरी करने की गुहार लगाई थी. लेकिन 25 मार्च 2026 को CJM कोर्ट ने इन याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि रिकॉर्ड पर आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं. निचली अदालत के इसी फैसले को आरोपियों ने रांची के न्यायायुक्त की अदालत में चुनौती दी थी.
लैब रिपोर्ट में नहीं मिली मिलावट
बचाव पक्ष ने दलील थी कि लैब रिपोर्ट में मिलावट की पुष्टि नहीं हुई है. पुनरीक्षण याचिका पर बहस के दौरान आरोपियों के वकील ने अदालत को बताया कि यह पूरी प्रक्रिया कानून का दुरुपयोग है. उन्होंने तर्क दिया कि सरकारी लैबोरेट्री (FSSAI Lab) की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि खाद्य पदार्थों के सभी सैंपल तय मानकों के अनुरूप थे और उनमें किसी भी तरह की मिलावट या हानिकारक केमिकल नहीं पाया गया था. बचाव पक्ष ने लैबोरेट्री रिपोर्ट में केवल कुछ छोटी मोटी लापरवाही की बात सामने आयी थी.
