Saraikela: विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर रविवार को ऑल इंडिया सरना धर्म चेमेद आसड़ा, झोराडीह के तत्वावधान में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस दौरान आदिवासी समाज की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक पहचान को बचाने पर विशेष जोर दिया गया. कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने पारंपरिक रीति-रिवाज, पूजा-पद्धति और संस्कृति को संरक्षित रखने का संकल्प लिया.

आधुनिकता के बीच लुप्त होती परंपराओं पर चिंता
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ऑल इंडिया सरना धर्म चेमेद आसड़ा की अध्यक्ष हीरामुनी मुर्मू ने कहा कि आदिवासियों की प्राकृतिक पहचान धीरे-धीरे लुप्त होने के कगार पर है. उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में लोग तेजी से आधुनिक जीवनशैली की ओर बढ़ रहे हैं, जिसके कारण पारंपरिक तौर-तरीके और संस्कृति पीछे छूटती जा रही है.

पहचान केवल भाषा या पहनावे तक सीमित नहीं
हीरामुनी मुर्मू ने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान केवल भाषा या पहनावे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें प्रकृति, परंपराओं, पूजा-पद्धति और सामुदायिक जीवन में गहराई से जुड़ी हैं. उन्होंने नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया.

पूजा स्थलों के संरक्षण पर भी चिंता
कार्यक्रम में सचिव कान्हु राम टुडू ने आदिवासी समाज के पारंपरिक पूजा स्थलों के संरक्षण पर चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि कई गांवों में आदिवासियों के पारंपरिक पूजा स्थल, जैसे जाहेरगाड़, धीरे-धीरे लुप्त होने की स्थिति में हैं. उन्होंने कहा कि ये पूजा स्थल आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़े हैं. इसलिए पारंपरिक पूजा-पद्धति और नियमों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं.
कई गणमान्य लोग रहे उपस्थित
इस अवसर पर बुढ़ान सरेन, निड़ो मुनी मुर्मू, उकिल मुर्मू, सुकेन हांसदा, जगेश्वर सरेन, भानुमती मुर्मू सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे.

