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सुरक्षा वापस, सियासत शुरू: मंत्री जी का त्याग है या सरकार पर प्रहार, महागठबंधन के भीतर कोऑर्डिनेशन का नया क्लाइमेक्स

Ravi Bharti Ranchi: सियासत की बिसात पर कब कौन सा मोहरा क्या चाल चल दे, यह बता पाना ज्योतिषी के लिए भी...

Security withdrawn, politics begins: Is this a minister's resignation or an attack on the government? A new climax in coordination within the Grand Alliance.

Ravi Bharti

Ranchi: सियासत की बिसात पर कब कौन सा मोहरा क्या चाल चल दे, यह बता पाना ज्योतिषी के लिए भी टेढ़ी खीर है. झारखंड की राजनीति में इन दिनों कुछ ऐसा ही ट्विस्ट आया है, जिसने सत्ता के गलियारों में सन्नाटा तो नहीं, पर खुसफुसाहटों का शोर जरूर बढ़ा दिया है. राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने अपनी सुरक्षा लौटाकर न केवल पुलिस महकमे को सकते में डाल दिया है, बल्कि महागठबंधन की स्मूथ दिख रही गाड़ी में ब्रेक लगने के संकेत भी दे दिए हैं.

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सुरक्षा कवच या सियासी अस्त्र

आमतौर पर राजनेता अपनी सुरक्षा बढ़वाने के लिए एडी-चोटी का जोर लगा देते हैं. सुरक्षा गार्ड की संख्या उनके कद का पैमाना मानी जाती है, ऐसे में, किसी मंत्री का खुद आगे बढ़कर सरकारी सुरक्षा को टा-टा कह देना, किसी अजूबे से कम नहीं है. सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि यह कोई वैराग्य नहीं, बल्कि एक सोची-समझी सियासी स्ट्रैटेजी है. क्या यह वही पुराना दांव है जिसे बिहार में लालू परिवार ने आजमाया था. जब-जब सियासी जमीन खिसकने का अंदेशा होता है, सुरक्षा लौटाना एक बेहतरीन पब्लिसिटी स्टंट साबित होता है. यह जनता के बीच यह संदेश देने का सबसे कारगर तरीका है कि देखिए, हमें अपनी जान की परवाह नहीं, बस राज्य की सेवा का जज्बा है.

समन्वय का सन्नाटा और पत्र का प्रहार

अभी कुछ दिन पहले ही मंत्री जी ने अनुसूचित जाति राज्य आयोग के गठन में देरी को लेकर मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था. तब समन्वय का मुद्दा उठा था. अब सुरक्षा का यह त्याग उसी कड़ी का अगला हिस्सा माना जा रहा है. राजनीति के जानकारों की मानें तो गठबंधन सरकार में कोऑर्डिनेशन का मतलब अक्सर वही होता है जो अक्सर फिल्म के अंत में दिखता है, सब ठीक है, लेकिन पर्दे के पीछे क्लाइमेक्स की तैयारी चल रही है. अब यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन एक बात साफ है कि सुरक्षा वापस लेकर मंत्री ने सियासत का तापमान जरूर बढ़ा दिया है.

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सत्ता के खेल में बलिदान का तड़का

आज की राजनीति में त्याग भी एक निवेश है. राधाकृष्ण किशोर ने अपनी सुरक्षा लौटाकर जो दांव चला है, वह सीधे तौर पर सरकार के कामकाज की शैली पर एक कटाक्ष है. अब देखना यह है कि मंत्री का यह वीआईपी-एग्जिट सरकार को आईना दिखाता है या खुद मंत्री जी को ही किसी नई सियासी राह पर ले जाता है. राजनीति की इस शतरंज में ऊंट किस करवट बैठेगा, यह फिलहाल सस्पेंस है, लेकिन इस सुरक्षा वापसी ने यह साबित कर दिया है कि झारखंड की सियासत में शांति के नाम पर भी तूफान पल रहे होते हैं.

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