Ranchi: कहते हैं कांग्रेस में राजनीति शह और मात का खेल नहीं, बल्कि चमत्कार और नमस्कार का मिश्रण है. झारखंड कांग्रेस में आजकल कुछ ऐसा ही नजारा है. राज्यसभा टिकट की रेस में दौड़ रहे प्रदीप बलमुचू, राजेश ठाकुर और केशव महतो कमलेश जैसे दिग्गज नेता अभी वार्मअप ही कर रहे थे कि दिल्ली दरबार से एक ऐसा “पैराशूट छूटा” कि सबकी उम्मीदें जमीन पर आ गिरी. आलाकमान ने प्रणव झा के नाम पर मुहर क्या लगाई, टिकट की आस लगाए बैठे सूरमाओं के दिल के अरमां आंसुओं में बह गए.
सन्नाटा भी सुगबुगाहट भी
पार्टी के अंदर इस समय सन्नाटा भी है और सुगबुगाहट भी. दिग्गज नेताओं के दांव धरे के धरे रह गए और अंदरूनी लोकतंत्र कोने में बैठकर मुस्कुरा रहा है. सालों तक धूप में बाल सफेद करने वाले और संगठन को खून-पसीने से सींचने वाले नेता अब बंद कमरों में वफादारी का सूचकांक तलाश रहे है.

फुरकान अंसारी का छलका दर्द
इस पूरी पटकथा में सबसे दमदार और भावुक मोड़ तब आया जब पार्टी के कद्दावर नेता और पूर्व सांसद फुरकान अंसारी का दर्द सोशल मीडिया पर छलक पड़ा. लिखा है कि पूरी जिंदगी कांग्रेस को मजबूत करने और समाज को जोड़ने में लगा दी. दुख इस बात का नहीं कि पद नहीं मिला, पीड़ा इस बात की है कि दशकों के समर्पण और संघर्ष को नजरअंदाज कर दिया गया. जिस उम्र में सम्मान होना चाहिए, वहां उपेक्षा मिल रही है. पीड़ा व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उन हजारों जमीनी कार्यकर्ताओं की है जो दरी बिछाते-बिछाते थक गए, लेकिन मलाई कोई और खा गया. हालांकि, कांग्रेसी संस्कार निभाते हुए उन्होंने खुद को पार्टी का सिपाही भी बताया. शायद इस उम्मीद में कि आलाकमान अगली बार जमीनी हकीकत का चश्मा पहनकर फैसले लेगा.
जमीनी संघर्ष बनाम दिल्ली कनेक्शन
झारखंड कांग्रेस की इस अंतर्कलह ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि राजनीति में ‘क्रेडेंशियल’ से ज्यादा ‘कनेक्शन’ मायने रखता है. जो नेता राज्य की सड़कों पर संगठन को मजबूत करने का दंभ भर रहे थे, उन्हें अब समझ आ रहा है कि राज्यसभा का रास्ता झारखंड की गलियों से नहीं, बल्कि दिल्ली के गलियारों से होकर गुजरता है. देखना दिलचस्प होगा कि प्रणव झा की यह उम्मीदवारी पार्टी को राज्यसभा में कितनी मजबूती देती है, लेकिन फिलहाल इसने राज्य इकाई के अंदर असंतोष की एक नई झांकी जरूर दिखा दी है.
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