Ranchi: अगर आपको लगता है कि प्रोजेक्ट भवन और नेपाल हाउस में सिर्फ विकास की योजनाएं बनती हैं, तो आप गलत हैं. इन दिनों वहां एक नई योजना पर गहन शोध चल रहा है, जिस टॉपिक पर शोध चल रहा है वह है बिना लक्ष्मी के कैलेंडर कैसे काटें? 8 अप्रैल बीत गई, लेकिन वेतन दर्शन अभी दुर्लभ बना हुआ है.
कैंटीन में उधार का सन्नाटा
नेपाल हाउस की कैंटीन में जो बाबू पहले दो समोसे और एक्स्ट्रा चटनी का रौब झाड़ते थे, वे अब कोने में बैठकर चुपचाप बिस्कुट चबा रहे हैं. कैंटीन वाले की उधार वाली डायरी इतनी भर गई है कि वह अब रजिस्टर के नए पन्ने खरीदने के लिए खुद वेतन का इंतजार कर रहा है. जैसे ही कोई परिचित टकराता है, दुआ-सलाम की जगह पहला सवाल यही गूंजता है, मैसेज आया क्या?

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ईएमआई बाउंस हो गई तो बैंक वाले घर के बाहर होर्डिंग लगा देंगे
प्रोजेक्ट भवन की लिफ्ट से लेकर नेपाल हाउस के गलियारों तक, फुसफुसाहटों का बाजार गर्म है. चर्चा के कुछ बातें न्यूज वेव संवाददाता के समक्ष लीक भी हुई. कर्मी-पदाधिकारी यह कहते नजर आए कि अरे भाई, गाड़ी की ईएमआई बाउंस हो गई तो बैंक वाले घर के बाहर प्रोजेक्ट भवन से बड़ा होर्डिंग लगा देंगे.
बीवी का अल्टीमेटम
एक बड़े बाबू को कहते सुना गया, ऑफिस में तो फाइलें अटका देते हैं, पर घर में पत्नी ने राशन की लिस्ट अटका दी है. 8 तारीख हो गई, अब तो टमाटर भी आंखें दिखाने लगा है. कुछ लोग इस बात पर भी चुटकी ले रहे हैं कि सरकार डिजिटल इंडिया की बात करती है और हमारा मैसेज अभी तक बैलगाड़ी पर बैठकर आ रहा है.
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फाइलों की रफ्तार और खाली पेट का तालमेल
सचिवालय के गलियारों में अब वर्क फ्रॉम होम की नहीं, वर्क विदाउट मनी की ट्रेनिंग चल रही है. बाबुओं का कहना है कि जब पेट में चूहे मनरेगा की खुदाई कर रहे हों, तो फाइल पर दस्तखत करते समय हाथ थोड़ा कांप ही जाता है. कुछ अनुभवी कर्मियों का तो यहां तक कहना है कि वेतन नहीं मिलने से सिस्टम में इतनी शांति है कि आप अपनी जेब के फटे होने की आवाज भी साफ सुन सकते हैं. फिलहाल प्रोजेक्ट भवन के कर्मचारी उस ऐतिहासिक मैसेज अलर्ट की प्रतीक्षा में हैं, जो उनके सूखे हुए बैंक खातों में हरियाली ला सके. तब तक, कानाफूसी ही असली मनोरंजन है.


