Ranchi: झारखंड के ग्रामीण अंचलों में इन दिनों अपनी अनूठी संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराओं को सहेजने के लिए एक अनूठा वैचारिक आंदोलन करवट ले रहा है. इस मुहिम की कमान किसी राजनेता ने नहीं, बल्कि भारतीय राजस्व सेवा की तेजतर्रार अधिकारी निशा उरांव ने संभाली है. उन्होंने धर्मांतरण के गहरे सामाजिक दुष्प्रभावों को एक बेहद मार्मिक और वैज्ञानिक उपमा के जरिए समझाते हुए आगाह किया है, कि मूल आस्था को छोड़ना अपनी ही पहचान को हमेशा के लिए मिटा देने जैसा है. निशा उरांव ने आदिवासी समाज की तुलना एक विशाल और हरे-भरे वृक्ष से करते हुए वैचारिक बदलाव की नई अलख जगाई है. उन्होंने कहा मान लीजिए कि हमारा समाज एक विशाल वृक्ष की तरह है. जब तक हम अपनी मूल आस्था, लोकगीत, संस्कृति और पारंपरिक पूजा-पद्धति का पालन करते हैं, तब तक हम अनजाने में इस पेड़ की जड़ों में खाद और पानी दे रहे होते हैं. इससे समाज हमेशा पुष्पित और पल्लवित रहता है.

आस्था बदलना सिर्फ पूजा बदलना नहीं
पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस विधायक रामेश्वर उरांव की बेटी निशा उरांव का यह अभियान ग्रामीण इलाकों में तेजी से जनसमर्थन हासिल कर रहा है. उन्होंने आदिवासियों को चेताया कि लालच या किसी अन्य प्रभाव में आकर धर्म परिवर्तन करना सिर्फ प्रार्थना करने का तरीका बदलना नहीं है. यह अपने ही हाथों अपनी विरासत का गला घोंटना है. कहा कि जब कोई व्यक्ति अपने पूर्वजों के देवी-देवताओं को भूलकर धर्म त्याग देता है, तो वह वास्तव में उस महावृक्ष की जड़ों में चुपके से नमक डाल रहा होता है. विज्ञान गवाह है कि यदि किसी पेड़ की जड़ में नमक पहुंच जाए, तो वह असमय ही सूखकर दम तोड़ देता है. ठीक वैसे ही, यदि आदिवासी समाज ने अपनी मूल पहचान खो दी, तो सांस्कृतिक विविधता का यह गौरवशाली वृक्ष हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगा.
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