Ranchi: अमन साहू का एनकाउंटर हुआ तो उसे गैंगस्टर कहा गया, हिड़मा का नाम आया तो उसे माओवादी कहा गया, फूलन देवी की कहानी लिखी गई तो उसे डाकू कहा गया, और भरत तिवारी की चर्चा हुई तो उसे क्रांतिकारी कहा गया. सोशल मीडिया पर पोस्ट कर अपराधी राहुल सिंह ने यह बातें कही हैं. राहुल सिंह ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर आगे लिखा है कि सवाल यह है कि किसी इंसान की पूरी जिंदगी का फैसला आखिर एक शब्द से कैसे कर दिया जाता है? क्या किसी व्यक्ति की पहचान केवल उस लेबल से तय होनी चाहिए जो समाज, सत्ता, मीडिया या इतिहास उसके माथे पर चिपका देता है?
क्या हमारे समाज में लोगों का मूल्यांकन हमेशा निष्पक्ष तरीके से होता है?
राहुल सिंह ने पोस्ट में आगे लिखा है कि यह भी एक गंभीर प्रश्न है कि क्या हमारे समाज में लोगों का मूल्यांकन हमेशा निष्पक्ष तरीके से होता है, या कभी-कभी उनकी जाति, समुदाय, क्षेत्र और सामाजिक पृष्ठभूमि भी लोगों की राय को प्रभावित करती है? कई लोगों का मानना है कि अलग-अलग समुदायों से आने वाले व्यक्तियों को समाज और व्यवस्था अलग नजरिए से देखती है. जब अमन साहू, फूलन देवी या हिड़मा जैसे नामों पर चर्चा होती है, तब अक्सर बहस केवल उनके कार्यों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उनके सामाजिक और जातीय संदर्भ भी चर्चा का हिस्सा बन जाते हैं. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हर व्यक्ति को एक समान दृष्टि से देखा जा रहा है, या फिर उसके बारे में धारणा बनाने में उसकी पहचान भी भूमिका निभा रही है?

परिस्थितियां और कर्मों को समझना जरूरी है
राहुल सिंह ने आगे लिखा है कि किसी भी व्यक्ति के बारे में अंतिम निर्णय देने से पहले उसकी पूरी कहानी, उसके संघर्ष, उसकी परिस्थितियां और उसके कर्मों को समझना जरूरी है. इतिहास गवाह है कि कई बार जिन लोगों को खलनायक कहा गया, उनकी कहानी का दूसरा पहलू भी था, और जिन्हें नायक माना गया, वे भी सवालों से परे नहीं थे. एक न्यायपूर्ण समाज की पहचान यही है कि वह किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी जाति, धर्म, समुदाय या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों, सच्चाई और उसके कर्मों के आधार पर करे. न्याय का पैमाना सबके लिए एक समान होना चाहिए, तभी समाज में वास्तविक समानता और विश्वास कायम हो सकता है. अमन साहू जी, हिड़मा जी और फूलन देवी जी और भरत तिवारी जी! को दिल से नमन.


