जहां आस्था के आगे झुक गया रहस्य: बनासो की मां महामाया बागेश्वरी सदियों से सुन रही हैं भक्तों की पुकार

Hazaribagh: घने वृक्षों की छांव, प्रकृति की अनुपम शांति और भक्ति की अलौकिक अनुभूति, कुछ ऐसा ही एहसास होता है जब श्रद्धालु...

Hazaribagh: घने वृक्षों की छांव, प्रकृति की अनुपम शांति और भक्ति की अलौकिक अनुभूति, कुछ ऐसा ही एहसास होता है जब श्रद्धालु हजारीबाग जिले के विष्णुगढ़ प्रखंड अंतर्गत बनासो स्थित मां महामाया बागेश्वरी धाम की पावन धरती पर कदम रखते हैं. यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही लोकआस्था, धार्मिक परंपराओं और अनगिनत चमत्कारी मान्यताओं का जीवंत केंद्र है. यहां आने वाला हर श्रद्धालु अपने साथ विश्वास लेकर आता है और लौटते समय अपने भीतर एक अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा महसूस करता है. प्रखंड मुख्यालय से कुछ दूरी पर स्थित यह प्राचीन शक्तिपीठ आज झारखंड ही नहीं, बल्कि बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा समेत कई राज्यों के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है. मान्यता है कि मां बागेश्वरी के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूर्ण होती है. शायद यही कारण है कि यहां प्रतिदिन श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहती हैं. कोई संतान प्राप्ति की कामना लेकर आता है, तो कोई परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली के लिए माता के चरणों में माथा टेकता है. स्थानीय परंपरा के अनुसार मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु अपने बच्चों का मुंडन संस्कार यहां कराते हैं तथा माता को बकरे की बलि अर्पित कर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं. वर्षों पुरानी यह परंपरा आज भी पूरे विश्वास और निष्ठा के साथ निभाई जा रही है.

रहस्य और आस्था से जुड़ी है मंदिर की कहानी

मां महामाया बागेश्वरी धाम का इतिहास जितना प्राचीन है, उतना ही रहस्यमयी भी माना जाता है. मंदिर के प्रबंधक राजकिशोर पांडेय बताते हैं कि प्राचीन काल में इस क्षेत्र पर बनासवार नामक राजा का शासन था, जिनके नाम पर ही इस गांव का नाम बनासो पड़ा. लोककथाओं के अनुसार उस समय मंदिर में पूजा-अर्चना करने जाने वाले पुजारियों की रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु हो जाया करती थी. यह सिलसिला वर्षों तक चलता रहा, जिसके कारण मंदिर में पूजा-पाठ लगभग बंद हो गया. राजा स्वयं भी इस रहस्य से चिंतित थे और कोई भी व्यक्ति मंदिर में पूजा करने का साहस नहीं जुटा पाता था. इसी दौरान बिहार के गया क्षेत्र से लक्षी पंडा नामक एक ब्राह्मण यहां पहुंचे. राजा ने उन्हें मंदिर से जुड़ी घटनाओं की पूरी जानकारी दी और चेतावनी भी दी कि जो भी यहां पूजा करने जाता है, वह जीवित वापस नहीं लौटता. लेकिन लक्षी पंडा ने माता की शक्ति पर अटूट विश्वास जताया और निर्भीक होकर पूजा-अर्चना का संकल्प लिया. कहा जाता है कि उन्होंने पूरे विधि-विधान से मां की आराधना की और सकुशल मंदिर से बाहर निकल आए. इस घटना को लोगों ने माता का चमत्कार माना. इसके बाद मंदिर में नियमित पूजा-पाठ की परंपरा पुनः आरंभ हुई और लक्षी पंडा को मंदिर का प्रथम स्थायी पुजारी बनाया गया.

एक परिवार से डेढ़ सौ परिवारों तक की विरासत

इतिहास के स्थानीय जानकार बताते हैं कि लक्षी पंडा की दो पत्नियां थीं. समय के साथ उनका वंश बढ़ता गया और आज उनके वंशजों के लगभग डेढ़ सौ परिवार बनासो गांव में निवास करते हैं. यही परिवार पीढ़ियों से मंदिर की पूजा-अर्चना और धार्मिक परंपराओं का निर्वहन कर रहे हैं. मान्यता है कि तत्कालीन राजा ने पुजारियों के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त भूमि दान में दी थी. उसी व्यवस्था की बदौलत आज भी यह परिवार मंदिर की सेवा और परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं.

भव्यता और श्रद्धा का अद्भुत संगम

करीब सात-आठ वर्ष पूर्व स्थानीय पुजारियों और श्रद्धालुओं के सहयोग से मां महामाया बागेश्वरी मंदिर तथा समीप स्थित शिव मंदिर का व्यापक जीर्णोद्धार कराया गया. आज मंदिर का भव्य और आकर्षक स्वरूप श्रद्धालुओं को पहली नजर में ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है. मंदिर में विराजमान मां बागेश्वरी को छह भुजाओं वाली शक्तिस्वरूपा देवी माना जाता है. परिसर में शिवलिंग सहित कई देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित हैं, जहां श्रद्धालु सुख, शांति और समृद्धि की कामना के साथ पूजा-अर्चना करते हैं.

धार्मिक पर्यटन के नक्शे पर उभरता केंद्र

हजारीबाग जिला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर तथा विष्णुगढ़-गोमिया मुख्य मार्ग से करीब आधा किलोमीटर अंदर स्थित यह धाम अब धार्मिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में भी अपनी पहचान बना रहा है. नवरात्र, रामनवमी और अन्य प्रमुख धार्मिक अवसरों पर यहां हजारों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ता है.

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आस्था की वह शक्ति, जो हर भय पर भारी है

मां महामाया बागेश्वरी धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि लोकआस्था, इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का ऐसा संगम है, जिसने पीढ़ियों से लोगों के विश्वास को जीवित रखा है. यहां पहुंचने वाला हर श्रद्धालु माता के चरणों में शीश झुकाकर यही अनुभव करता है कि जब विश्वास अडिग हो, तो आस्था के आगे हर संकट, हर भय और हर रहस्य छोटा पड़ जाता है.

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