Hazaribagh: घने कोहरे की एक सफेद और रहस्यमयी चादर ने पूरे शहर को अपनी आगोश में ले रखा था. हड्डियों को जमा देने वाली बर्फीली हवाएं चल रही थीं और घड़ी की सूइयां 2025 की उस आखिरी काली रात के ढलने का इशारा कर रही थीं. हजारीबाग का ऐतिहासिक ‘जयप्रकाश नारायण केंद्रीय कारागार’ अपनी विशाल लाल ईंटों की दीवारों के साथ मुस्तैद खड़ा था. एक ऐसी अभेद्य इमारत, जिसके सुरक्षा घेरे को लेकर यह दावा दशकों से किया जाता रहा है कि यहां परिंदा भी पर मारे तो वॉच-टावरों पर तैनात सशस्त्र जवानों की राइफलों के ट्रिगर दब जाते हैं. लेकिन उसी ढलती रात के सन्नाटे में इस विशालकाय दीवार के साये में एक ऐसा दुस्साहस रचा जा रहा था, जिसकी पटकथा किसी हॉलीवुड की क्राइम-थ्रिलर फिल्म से कम नहीं थी. इस सनसनीखेज वारदात ने न सिर्फ भारतीय जेल व्यवस्था के दावों की धज्जियां उड़ाते हुए तार-तार कर दिया, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत के दौर के 83 साल पुराने एक सोए हुए इतिहास के पन्नों को भी अचानक से पलट कर रख दिया.

1942 का ‘दिवाली धमाका’ और 2025 की ‘न्यू ईयर इव’
इतिहास के पन्नों पर जमी धूल को अगर झाड़ा जाए, तो साल 1942 की दिवाली की वो खौफनाक रात याद आती है. चारों तरफ दीयों की जगमगाती रोशनी थी और पटाखों का गूंजता शोर. उसी शोर की आड़ लेकर लोकनायक जयप्रकाश नारायण अपने पांच जांबाज साथियों योगेंद्र शुक्ला, सूरज नारायण सिंह, गुलाब चंद गुप्ता, रामनंदन मिश्रा और शालिग्राम सिंह के साथ जेल की 18 फीट ऊंची विशालकाय दीवार लांघकर अचानक गायब हो गए थे. तब सूती धोतियों को आपस में बांधकर रस्सी बनाई गई थी, और उस एक ऐतिहासिक घटना ने पूरी ब्रिटिश सल्तनत की नींद उड़ा कर रख दी थी. दशकों तक दुनिया यह मानती रही कि वैसी हैरतअंगेज वारदात अब सिर्फ इतिहास की किताबों या पुरानी कहानियों में सिमट कर रह गई है. लेकिन 83 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद, 31 दिसंबर 2025 की रात इतिहास ने खुद को बिल्कुल उसी फिल्मी और खौफनाक अंदाज में दोहराया. फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार दीवार लांघने वाले देश की आजादी के दीवाने नहीं थे, बल्कि जघन्य अपराधों में उम्रकैद की सजा काट रहे तीन बेहद शातिर और खूंखार मुजरिम थे.

साजिश की खौफनाक पटकथा: वार्ड नंबर-4 का अंधियारा
जेल के सबसे सुरक्षित और संवेदनशील माने जाने वाले सेक्टर-6 के वार्ड नंबर-4 में बंद तीन कैदी देवा भुइयां उर्फ देव कुमार, राहुल रजवार और जितेंद्र रवानी महीनों से एक ही फिराक में थे. तीनों के माथे पर उम्रकैद का ठप्पा लगा हुआ था. उन्हें भली-भांति अहसास हो चुका था कि अगर वे यहां से सलामत नहीं निकले, तो उनकी जिंदगी का आखिरी अध्याय इसी अंधेरी और नम कोठरी में खत्म हो जाएगा. रात के ठीक 1:30 बजे, जब पूरा जेल प्रशासन नए साल के जश्न के खुमार और गश्त की ढिलाई में डूबा हुआ था, तब तीनों शातिर कैदी अचानक हरकत में आए. कई दिनों की खामोश मेहनत से ढीली की गई वॉशरूम की जंग लगी लोहे की छड़ को उन्होंने एक ही झटके में उखाड़ फेंका. सूती बेडशीटों को फाड़कर बनाई गई मजबूत रस्सी और एक भारी लोहे का हुक लेकर तीनों दबे पांव आगे बढ़े. जेल के भीतर बनी गौशाला के पास पहुंचकर लगभग 10 मिनट तक उन्होंने अपनी सांसें रोककर पहरेदारों के भारी कदमों की आहट ली और फिर उनके सामने आई 17 फीट ऊंची वो मुख्य बाउंड्री वॉल, जो जेल के भीतर की कैद और बाहर की आजादी के बीच इकलौती रुकावट बनी खड़ी थी. लोहे का हुक दीवार के ऊपरी हिस्से पर अटका, चादर की रस्सी कसी गई और एक-एक करके तीनों फौलादी बाउंड्री वॉल फांदकर बाहर की गीली मिट्टी पर छलांग लगा गए. अगले दिन तड़के जब जेल में सायरन बजा और कैदियों की गिनती में 3 नाम कम मिले, तो हजारीबाग से लेकर रांची के उच्च प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया.

5 राज्यों में ‘द ग्रेट एस्केप’ और पुलिस की उड़ी नींद
जेल की दीवार फांदते ही तीनों अपराधियों ने अपनी पहचान और रास्ते ऐसे बदले मानो पर्दे पर कोई सस्पेंस ड्रामा चल रहा हो. हजारीबाग के सिंदूर चौक से होते हुए वे इचाक के ‘कुड़हा’ गांव पहुंचे. वहां अपने एक करीबी के ठिकाने पर उन्होंने अपना हुलिया बदला, थोड़े पैसे जुटाए और शुरू हुआ पुलिस की पहुंच से दूर भागने का चूहे-बिल्ली का कातिलाना खेल. बरकट्ठा और बरही के धूल भरे रास्तों को पार करते हुए तीनों कोडरमा स्टेशन पहुंचे. वहां से बिहार के गया और फिर देवघर के जसीडीह में दो दिनों तक छुपने का खेल चलता रहा. वे अच्छी तरह जानते थे कि पूरे झारखंड की पुलिस उनकी तलाश में खाक छान रही है, इसलिए वे चुपचाप जसीडीह-पुणे एक्सप्रेस में सवार हो गए. उनका नया ठिकाना बना महाराष्ट्र का दूरदराज सोलापुर जिला. करमाला थाना क्षेत्र के ‘कोर्थी गांव’ में स्थित एक गुमनाम ईंट-भट्टे पर तीनों ने मजदूरी का काम शुरू कर दिया. चेहरों पर मिट्टी-कालिख, हाथों में ईंटें और दिल में यह वहम कि वे कानून के लंबे हाथों को हमेशा के लिए चकमा दे चुके हैं.
मिडनाइट सर्जिकल स्ट्राइक: जब ईंट-भट्टे पर गूंजी ‘हैंड्स अप!’
उधर, हजारीबाग पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बिना सोए 24 घंटे सिर्फ एक सुराग की तलाश में भटक रही थी. पुलिस ने उनके रिश्तेदारों, पुराने आपराधिक रिकॉर्ड्स और मोबाइल टावरों के डेटा का ऐसा तकनीकी जाल बुना कि आखिरकार एक महीन डिजिटल सिग्नल ने महाराष्ट्र के उस गुमनाम ईंट-भट्टे का सटीक लोकेशन उगल दिया. काली रात के सन्नाटे में झारखंड SIT और महाराष्ट्र पुलिस की संयुक्त टीम ने पूरे ईंट-भट्टे को चारों तरफ से खामोशी से घेर लिया. टॉर्च की तेज और चौंधिया देने वाली रोशनी सीधे सोए हुए कैदियों की आंखों पर पड़ी. बिना एक भी गोली चलाए, तीनों के सिर पर पिस्तौल तान दी गई और हवा में गूंजी एक कड़क आवाज-“हैंड्स अप!”. 10 दिनों की सनसनीखेज फरारी, हजारों किलोमीटर का सफर और जेल तोड़ने का घमंड सबकुछ कुछ ही सेकेंड्स में खाक में मिल गया.
दो युग, एक दीवार: इतिहास का कड़वा सच
हजारीबाग जेल की वो ऐतिहासिक लाल दीवार आज भी उसी जगह सीना ताने खड़ी है, जो चीख-चीखकर दो अलग-अलग दौर की कहानियां बयान करती है. साल 1942 का वो दौर, जहां मातृभूमि की आजादी के लिए धोती की रस्सी बनाकर इतिहास रचा गया था और वो दुस्साहस क्रांति का अमर प्रतीक बना. वहीं, आज का यह दौर, जहां सलाखें और कानून तोड़कर भागने वाले शातिर मुजरिमों के दुस्साहस का अंत लोहे की ठंडी हथकड़ियों और कालकोठरी के उसी अंधेरे में जाकर हुआ. यह घटना जहां एक तरफ पुलिसिया तफ्तीश और SIT की त्वरित कार्रवाई की मिसाल पेश करती है, वहीं दूसरी तरफ देश की हाई-सिक्योरिटी जेलों की सुरक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा यक्ष प्रश्न भी छोड़ जाती है.

