पाकुड़: आधुनिक युग में भी झारखंड के पाकुड़ जिले के लिट्टीपाड़ा प्रखंड में आदिवासी गांवों को पेयजल संकट का सामना करना पड़ रहा है. बुनियादी सुविधा माने जाने वाले शुद्ध पेयजल के लिए यहां के लोग आज भी तरस रहे हैं.
पास में प्रखंड मुख्यालय, फिर भी पानी नहीं
लिट्टीपाड़ा प्रखंड मुख्यालय से महज 3 किलोमीटर दूर स्थित केरोदली गांव की स्थिति बेहद चिंताजनक है. यहां के ग्रामीणों को पीने के पानी के लिए करीब 1 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. वे दूषित झरने के पानी से अपनी प्यास बुझाने को मजबूर हैं, क्योंकि गांव में शुद्ध पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं है.
दर्जनों गांवों में वही हाल
केरोदली ही नहीं, बल्कि इस प्रखंड के दर्जनों गांव ऐसे हैं जहां आज भी लोगों को साफ पेयजल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है. ग्रामीणों की जिंदगी आज भी झरनों और कुओं के पानी पर निर्भर है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी खतरे भी बढ़ रहे हैं.
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217 करोड़ की योजना अधूरी
इस गंभीर समस्या को देखते हुए वर्ष 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास की सरकार के समय लिट्टीपाड़ा प्रखंड के लिए 217 करोड़ रुपये की बहुग्रामीण जलापूर्ति योजना स्वीकृत की गई थी. इस योजना को 20.03.2020 तक पूरा किया जाना था. लेकिन निर्धारित समय सीमा बीतने के कई वर्ष बाद भी यह योजना धरातल पर पूरी तरह लागू नहीं हो सकी है.
मुद्दा उठा, समाधान अब भी दूर
स्थानीय विधायक हेमलाल मुर्मू ने इस मुद्दे को सदन में उठाया है. वहीं, पाकुड़ दौरे पर पहुंचे रघुवर दास ने भी इस योजना को लेकर राज्य सरकार पर सवाल खड़े किए. इसके बावजूद अब तक जमीनी स्तर पर कोई ठोस सुधार नहीं दिख रहा है.
कब मिलेगा शुद्ध पानी
सबसे बड़ा सवाल यही है कि लिट्टीपाड़ा के सुदूरवर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों को आखिर कब शुद्ध पेयजल उपलब्ध होगा. आखिर कब तक यहां के लोग झरनों और कुओं के पानी पर निर्भर रहेंगे. यह सवाल अब भी बना हुआ है.
