सरायकेला: चांडिल क्षेत्र की दलमा वन्य-प्राणी आश्रयणी (193.22 वर्ग कि.मी.) कभी हाथियों का प्रमुख प्रजनन-केंद्र थी. 1990 से 2018 तक यहां हाथियों के झुंड और जलक्रीड़ा देखी जाती थी.
लेकिन अब अवैध कटाई, जंगल में आग और शिकार के कारण हाथियों के झुंड धीरे-धीरे चले गए हैं. हालात ये हैं कि अब केवल 1-2 हाथी ही कभी-कभार दिखाई देते हैं. कभी-कभी पश्चिम बंगाल के लालगढ़ और झाड़ग्राम से झुंड आते हैं, लेकिन जल्दी चले जाते हैं. इसका मुख्य कारण पौष्टिक चारा और पेड़-पौधों की कमी है.
हाथियों की घटती संख्या
दलमा सेंचुरी, जिसे स्थानीय लोग “गज परियोजना” कहते हैं, गर्मियों में झारखंड, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा के जंगलों से हाथियों को आकर्षित करती थी. मादा हाथी यहां बच्चों को जन्म देती थीं और उनका पालन करती थीं.
लेकिन अब जंगल की कटाई, आग और शिकार ने स्थिति बिगाड़ दी है. हाथियों के झुंड सुरक्षित महसूस नहीं करते और इचागढ़ विधानसभा क्षेत्र की ओर चले जाते हैं. दलमा में अब पर्याप्त पौष्टिक भोजन और पानी उपलब्ध नहीं है.
पर्यटन और गज परियोजना
करोड़ों की लागत से बनी गज परियोजना अपेक्षित काम नहीं कर रही है. चांडिल डैम जलाशय में अब भी कभी-कभार झुंड जलक्रीड़ा करती है. पर्यटक दूर-दराज से आए और हाथियों को देख खुश हुए.
लेकिन सवाल यह है कि दलमा सेंचुरी में हाथी क्यों नहीं टिकते? वन विभाग और सरकार लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर रही हैं, लेकिन जंगल में कटाई और आग पर रोक नहीं लग पा रही. नतीजा यह है कि हाथियों के झुंड सेंचुरी से इचागढ़ क्षेत्र में चले गए हैं.
