हजारीबाग में भूमाफियाओं की करतूत: फॉरेस्ट और गैरमजरुआ सरकारी जमीनों पर फर्जी हुकूमनामा से कब्जे की मची होड़

Hazaribagh: जिले में जंगलों की अंधाधुंध कटाई लगातार जारी है, जबकि संबंधित अधिकारी एसी कमरों में खुद को सीमित किए हुए नजर...

Hazaribagh: जिले में जंगलों की अंधाधुंध कटाई लगातार जारी है, जबकि संबंधित अधिकारी एसी कमरों में खुद को सीमित किए हुए नजर आ रहे हैं. पिछले तीन-चार वर्षों में जिस तेजी से जंगल कटे हैं, उसका असर आने वाली कई पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा.

जमीन के लालच में लोग इस कदर अंधे हो चुके हैं कि रातों-रात जेसीबी लगाकर पूरे जंगल को साफ कर सपाट मैदान में तब्दील किया जा रहा है. हैरानी की बात यह है कि न तो उच्च अधिकारी और न ही निचले स्तर के कर्मचारी इस पर ध्यान दे रहे हैं.

मिलीभगत से चल रहा बड़ा खेल

सूत्रों के अनुसार, मिलीभगत के इस बड़े खेल में जंगलों को गायब कर सपाट मैदान बनाया जा रहा है और फिर फर्जी हुकूमनामा के जरिए उस पर कब्जा कर खरीद-बिक्री की जा रही है. बड़कागांव रोड के आसपास बचे-खुचे जंगलों की कटाई हो या फिर आसपास के गांवों में गैरमजरुआ, सार्वजनिक जमीन या वन भूमि—हर जगह कब्जे का खेल जारी है. स्थानीय स्तर पर तथाकथित “गांव की सरकार” के लोग भी भू-माफियाओं के साथ मिलकर हिस्सेदार बन रहे हैं. थाना, अंचल और जिला प्रशासन को सूचना देने वाले लोग भी इस पूरे मामले में चुप्पी साधे हुए हैं.

नया टोंगरी में 40 एकड़ जंगल साफ

ताजा मामला कटकमदाग प्रखंड के बेस पंचायत क्षेत्र अंतर्गत नया टोंगरी इलाके का है, जहां करीब 40 एकड़ जमीन से जंगल पूरी तरह गायब कर दिया गया है. भू-माफियाओं ने जेसीबी मशीनों की मदद से जंगल साफ कर जमीन को सपाट मैदान में बदल दिया है और अब उसे बेचने की तैयारी की जा रही है. बताया जा रहा है कि इस क्षेत्र की अधिकांश जमीन वन भूमि और गैरमजरुआ सरकारी जमीन है.

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स्थानीय स्तर पर साठगांठ के आरोप

आरोप है कि इस जमीन की खरीद-बिक्री में वर्तमान मुखिया दीपक यादव, उनके भाई कृष्णा यादव और नसीम खान जैसे लोगों की साठगांठ सामने आ रही है. ये लोग मिलकर जमीन पर कब्जा कर उसे बेचने में जुटे हैं. हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है.

गरीब परिवारों पर मंडरा रहा खतरा

जमीन कब्जे की इस होड़ का असर वहां बसे गरीब परिवारों पर भी पड़ रहा है. इलाके में रहने वाले 20 से अधिक हरिजन परिवारों की जमीन पर खतरा मंडरा रहा है. उन्हें वहां से हटने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. दशकों से बसे इन परिवारों के लिए अब अपनी जमीन और आशियाना बचाना मुश्किल होता जा रहा है.

सवालों के घेरे में पूरा सिस्टम

पूरे मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. यदि समय रहते इस पर कार्रवाई नहीं की गई, तो न सिर्फ जंगल खत्म हो जाएंगे, बल्कि गरीबों का आशियाना भी उजड़ जाएगा. अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है.

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