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रांची के निजी स्कूलों की ‘फीस डकैती’—डीसी साहब का आदेश फेल, स्कूलों का खेल पास!

रांची: झारखंड की राजधानी में शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि एक ऐसा शातिर व्यापार बन चुकी है जहाँ नियम बनाने वाले प्रशासन...

रांची: झारखंड की राजधानी में शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि एक ऐसा शातिर व्यापार बन चुकी है जहाँ नियम बनाने वाले प्रशासन को भी ठेंगा दिखा दिया जाता है. पिछले दिनों रांची के उपायुक्त (DC) की बैठकों और ‘री-एडमिशन फीस’ खत्म करने के दावों से अभिभावकों की आँखों में जो उम्मीद की चमक थी, वह अब आंसुओं और गुस्से में बदल चुकी है.

हकीकत यह है कि स्कूलों ने डीसी साहब के आदेश की धज्जियाँ उड़ाते हुए लूट का नया रास्ता निकाल लिया है.

1. नाम बदला, काम नहीं: ‘री-एडमिशन’ गया, ‘डेवलपमेंट’ आया

प्रशासन ने पीठ थपथपाई कि हमने री-एडमिशन फीस बंद करा दी. लेकिन स्कूलों ने रातों-रात अपना ‘सॉफ्टवेयर’ अपडेट कर लिया. जहाँ पहले री-एडमिशन फीस ली जाती थी, अब वहाँ ‘एनुअल एक्टिविटी चार्ज’ या ‘इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फीस’ का लेबल चिपका दिया गया है.

अभिभावक का दर्द: “जेब उतनी ही खाली हो रही है, बस रसीद पर नाम बदल गया है. प्रशासन खुश है कि नियम लागू हुआ, स्कूल खुश है कि कमाई कम नहीं हुई, बस हम अभिभावक बेवकूफ बन गए.”

2. ‘ब्रांडेड कॉपियों’ का काला खेल: दुकान फिक्स, कमीशन फिक्स

कहने को तो कहा गया कि किताबें और कॉपियां कहीं से भी लें, लेकिन स्कूलों ने यहाँ ‘ब्रांडिंग’ का ऐसा जाल बुना है जिसे तोड़ना नामुमकिन है.

स्कूलों ने ऐसी दुकानों से सेटिंग कर रखी है जो विशेष ‘ब्रांड’ की कॉपियां छापते हैं.

ये कॉपियां शहर की किसी दूसरी दुकान में नहीं मिलतीं.

स्कूल का फरमान साफ है—”कॉपी वही चलेगी जो हमने बताई है.” यानी लूट का सीधा रास्ता, जहाँ दुकानदार और स्कूल की मिलीभगत से अभिभावकों को लूटा जा रहा है.

3. सिलेबस का ‘डबल गेम’: पुरानी किताबें भी बिकीं, नई भी बिकेंगी!

सबसे बड़ा घोटाला सीनियर क्लासेस के सिलेबस में सामने आया है. पहले बच्चों को पुराने सिलेबस की किताबें खरीदने पर मजबूर किया गया. जब किताबें खरीद ली गईं, तब फरमान आया कि ‘अब NCERT चलेगा’.

मास्टरस्ट्रोक: स्कूल का कहना है कि गर्मी की छुट्टियों तक पुरानी किताब पढ़ो और उसके बाद नई.

फायदा किसका? पुरानी किताब बिकने से कमीशन बन गया, और जुलाई में नई किताबें बिकने से फिर मोटा कमीशन बनेगा. अभिभावकों की जेब पर यह ‘डबल स्ट्राइक’ है.

4. दूध का दूध और पानी का पानी—क्या प्रशासन में दम है?

अभिभावक अब थक चुके हैं और प्रशासन से सीधे सवाल पूछ रहे हैं. उनका कहना है कि अगर प्रशासन वाकई गंभीर है, तो सिर्फ मीटिंग न करे, बल्कि ये कदम उठाए:

  • तुलनात्मक बोर्ड: हर स्कूल के बाहर पिछले साल और इस साल का पूरा ‘फीस स्ट्रक्चर’ बोर्ड पर लगवाया जाए.
  • पब्लिक ऑडिट: डीसी साहब खुद जांचें कि री-एडमिशन हटने के बाद दूसरे मदों (Heads) में फीस कितनी बढ़ी.

कड़वा सवाल:

क्या रांची जिला प्रशासन निजी स्कूलों के सिंडिकेट के सामने घुटने टेक चुका है? क्या डीसी साहब की बैठकों का मकसद सिर्फ अखबारों में सुर्खियां बटोरना था या वाकई गरीबों को राहत देना? अगर स्कूलों ने अपना तरीका बदल लिया है, तो प्रशासन अपनी कार्रवाई का तरीका क्यों नहीं बदल रहा?

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