विनीत आभा उपाध्याय
Ranchi: झारखंड की न्यायिक व्यवस्था के इतिहास में आज का दिन स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया है. रांची के डोरंडा में हाईकोर्ट की बेंच के रूप में शुरू हुआ न्यायिक सफर आज अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूरे कर चुका है. 1976 में एक छोटे से कदम से शुरू हुई यह यात्रा आज एक विशाल और आधुनिक न्याय के मंदिर के रूप में तब्दील हो चुकी है.
सर्किट बेंच से हाईकोर्ट तक का विकास
आज से ठीक 50 साल पहले वर्ष 1976 में तत्कालीन बिहार राज्य के दौरान रांची के डोरंडा इलाके में पटना उच्च न्यायालय की एक सर्किट बेंच का गठन किया गया था. इस बेंच की स्थापना का मुख्य उद्देश्य दक्षिण बिहार (अब झारखंड) के आदिवासी बहुल और सुदूरवर्ती इलाकों के लोगों को उनके घर के नजदीक सुलभ न्याय दिलाना था. वर्ष 1976 से लेकर वर्ष 2000 तक डोरंडा स्थित हेरिटेज बिल्डिंग परिसर में पटना हाईकोर्ट की बेंच के रूप में सुनवाई होती रही. जिसके बाद 15 नवंबर 2000 को जब झारखंड एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया तब इस बेंच को पूर्णकालिक झारखंड उच्च न्यायालय का दर्जा मिला और राज्य गठन के साथ ही न्यायिक कार्यों में तेजी आई और बुनियादी ढांचे का विस्तार शुरू हुआ.
धुर्वा में अत्याधुनिक न्यायिक परिसर की पहचान
50 वर्षों की इस यात्रा के दौरान ही झारखंड को देश का सबसे बड़ा और अत्याधुनिक हाईकोर्ट परिसर (धुर्वा में) भी मिला. डोरंडा के पुराने गलियारों से शुरू हुई यह चर्चा आज देश के सबसे आधुनिक न्यायालयों में शुमार है.
