पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार संजय सिंह की त्वरित टिप्पणी

रांची: नगर निकाय चुनाव लोकतंत्र की वह पहली सीढ़ी है, जहां आम नागरिक अपने शहर की सरकार चुनता है. पर जब इस प्रक्रिया में मतदाता ही भटक जाए, तो यह केवल अव्यवस्था नहीं, लोकतंत्र के साथ क्रूर मजाक है. सोमवार को नगर निकाय चुनाव में जो नजारा देखने को मिला, उसने चुनावी प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. एक ही परिवार के सदस्यों को अलग-अलग बूथों पर छितरा देना-क्या यह प्रशासनिक चूक नहीं, लापरवाही की पराकाष्ठा नहीं है?
किसी मतदाता को बताया गया कि उसका बूथ फलां जगह है. वहां पहुंचने पर जवाब मिला-“यहां नहीं, शायद कहीं और हो… देख लीजिए, गारंटी नहीं.” यह ‘शायद’ और ‘गारंटी नहीं’ का खेल क्या लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ खिलवाड़ नहीं?
हाथ में वोटर पर्ची, मन में उत्साह और भटकते मतदाता
हाथ में वोटर पर्ची, पहचान पत्र और मन में उत्साह लिए लोग एक बूथ से दूसरे बूथ तक भटकते रहे. प्रत्याशियों द्वारा वितरित पर्चियों में भी बूथ का पता गलत निकला. सवाल उठता है-जब उम्मीदवारों तक सही जानकारी नहीं पहुंची, तो आम मतदाता से भला क्या अपेक्षा करते? बूढ़े, महिलाएं, कामकाजी लोग घंटों भटकते रहे और अंततः थक-हारकर बिना मतदान किए लौट गए. उनके चेहरे पर सिर्फ थकान हीं नहीं, व्यवस्था के प्रति क्षोभ भी साफ झलक रहा था.
नीयत और प्रबंधन की विफलता
निर्वाचन आयोग निष्पक्ष और व्यवस्थित चुनाव कराने का संवैधानिक दायित्व निभाने का दावा करता है, पर जमीनी स्तर पर ऐसी कुव्यवस्था यह संकेत देती है कि स्थानीय प्रशासन और चुनावी तंत्र के बीच समन्वय में गंभीर कमी है. मतदाता सूची का अद्यतन, बूथों की स्पष्ट जानकारी और प्रभावी सूचना प्रणाली-ये कोई असंभव कार्य नहीं हैं.
डिजिटल युग में भी यदि नागरिक अपने बूथ का पता न लगा सके, तो यह तकनीकी नहीं, नीयत और प्रबंधन की विफलता है.लोकतंत्र केवल मतदान का दिन नहीं, बल्कि विश्वास का तंत्र है. जब नागरिक अपने ही नगर की सरकार चुनने में अपना योगदान देने से वंचित रह जाएं, तो उसकी आस्था दरकती है.
यह समय है आत्ममंथन का. जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो, प्रक्रिया की पारदर्शी समीक्षा हो और ऐसी पुनरावृत्ति पर कठोर कार्रवाई हो. अन्यथा “मतदाता जागरूक बनें” का नारा खोखला ही प्रतीत होगा.

