Hazaribagh: मिसिर बेसरा एक करोड़ का इनामी नक्सली, उम्र लगभग 70 वर्ष. अभी यह सारंडा के जंगलों में है सीआरपीएफ के घेराबंदी को तोड़ एक बार चकमा देकर निकलने में कामयाब रहा. अभी यह शातिर नक्सली सुरक्षा बलों के हिट लिस्ट में है. सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार सारंडा के जंगल में अब बस कुछ संख्या में नक्सली बचे हुए हैं.
पिछले चार दिनों से मिसिर बेसरा सहित 40-50 नक्सलियों को 10 किलोमीटर के दायरे में सीआरपीएफ के जवानों ने चारों तरफ से घेर रखा था. अभी भी घेराबंदी है. पूरे तरीके से इस इलाके की किलाबंदी की हुई है और धीरे-धीरे घेरा को छोटा भी किया जा रहा है. परसो के दिन खूब गोली बारी भी हुई थी. कुछेक सूचना ये मिल रही है कि पहले की भांति इस बार भी इतनी तगड़ी घेराबंदी के बाद भी मिसिर बेसरा चकमा देने में कामयाब हो गया है और भाग गया है. सीआरपीएफ के डीजी ने इन्हें एक महीने का अल्टीमेटम दिया है सरेंडर करने को.
पुत्र ने पिता से की भावुक अपील: सरेंडर कर दें
इस बीच जब मिसिर बेसरा घिरे हुए हैं सीआरपीएफ जवानों से तो इसके बेटे सिद्धार्थ बेसरा ने अपने पिता से भावनात्मक अपील की है कि वे आत्मसमर्पण कर दें और परिवार में लौट आये. पिछले 28 सालों से वह अपने पिता को देखा नहीं है. 7 साल का था तभी ये घर छोड़ कर जंगल को चले गए. कुछ वर्ष बाद मां भी चली गई. बहन की भी मौत हो गई. ये परिवार में अकेला पड़ गया. 10वीं तक की पढ़ाई हुई. मुंबई काम करने को गया. यहाँ मुंबई के एक पाउडर मिल में काम करता है जहां 9,000 रुपये सैलरी मिलती है. किसी तरह गुजर-बसर चल रहा है. अभी रांची में काम-धंधे की तलाश कर रहा कि अपने ही गृहराज्य में रहकर कुछ काम कर सके.
एक पुत्र का मर्माहत करने वाला सवाल
सिद्धार्थ जब अपने दादा जी से पूछता था कि पापा नक्सली क्यों बन गए तो उसके दादा जी बताते थे कि, “तुम्हारे पिता पढ़ने-लिखने में बड़ा तेज थे इन्हें सरकारी शिक्षक की नौकरी लगी थी लेकिन ज्वाइनिंग के समय इनसे 8,000 रुपये मांगे गए! मैं जमीन बेच के पैसा देने के लिए तैयार था कि बेटे की लाइफ सेट हो जाएगी. लेकिन तुम्हारे पिता ने ऐसा करने से मना कर दिया. बोला कि क्यों देंगे हम पैसे ? जब योग्यता है तो घूस क्यों दे हम ? पीके रॉय मेमोरियल कॉलेज, धनबाद से उस जमाने में पीजी करने बाद भी नौकरी के समय पैसा ही मांगा गया. तो ये आहत हो गए और बन्दूक पकड़ लिए.” उसके टैलेंटेड पिता मिसिर बेसरा हमारे सिस्टम का मारा एक बंदा था. ये सिस्टम से बाहर जा कर सिस्टम सुधारने को बंदूक उठाया लेकिन क्या कुछ बदलाव हुआ!
क्या मिसिर बेसरा के साथ हुआ आज लाखों युवाओं के साथ नहीं हो रहा?
वर्तमान हालात ये है कि जिस सिस्टम की मुखालपत कर मिसिर बेसरा ने हथियार उठाया क्या उस सिस्टम में कोई बदलाव हुआ? सिस्टम आज भी वही है जो 30/35 साल पहले था. क्या मिसिर बेसरा के साथ जो हुआ वो आज नहीं हो रहा है ? जेपीएससी की पीटी परीक्षा सम्पन्न हुई और आज हो-हल्ला है कि टॉप सीटें 1 करोड़ 20 लाख में सेट हो गई है. पिछले साल बीडीओ सीओ के दाम 70-80 लाख रुपये थे.
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JSSC-CGL के सीट 28-30 लाख रुपये में सेट हुए. पिछले हफ्ते उत्पाद सिपाही का एग्जाम था, एक गिरोह पकड़ा गया सेटिंग वाला. एग्जाम कैंसिल. ये फिर होगा और फिर सेटिंग होगी. आज इस सिस्टम के शिकार हजारों/लाखों युवा है.
