Ranchi : झारखंड, जिसे कृषि-पशुपालन आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए जाना जाता है, आज एक गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ा है. राज्य के ग्रामीण इलाकों में पशुओं का इलाज अब डॉक्टरों के बजाय झोलाछाप नीम-हकीमों के भरोसे है. पशुपालन विभाग में डॉक्टरों के आधे से अधिक पद खाली पड़े हैं, जिसका सीधा फायदा गांव-गांव में सक्रिय फर्जी डॉक्टर उठा रहे हैं.
स्वीकृत पदों का टोटा: 50% से अधिक कुर्सियां खाली
झारखंड में पशु चिकित्सा व्यवस्था का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है. राज्य में पशु चिकित्सकों के लगभग 550 से अधिक स्वीकृत पद हैं, लेकिन वर्तमान में 250 से भी कम नियमित डॉक्टर कार्यरत हैं.डॉक्टरों की कमी का आलम यह है कि एक पशु चिकित्सक को अपने मूल केंद्र के अलावा दो से तीन अन्य प्रखंडों या डिस्पेंसरियों का अतिरिक्त प्रभार संभालना पड़ रहा है.अस्पताल अक्सर बंद रहते हैं या वहां केवल चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ही मिलते हैं, जिससे आपात स्थिति में पशुओं को समय पर इलाज नहीं मिल पाता.
5,000 से अधिक सक्रिय फर्जी डॉक्टर
आंकड़ों के मुताबिक पूरे राज्य में 5,000 से अधिक ऐसे लोग सक्रिय हैं जिनके पास न तो कोई मेडिकल डिग्री है और न ही लाइसेंस. ये झोलाछाप डॉक्टर अधिक मुनाफे के चक्कर में पशुओं को भारी मात्रा में स्टेरॉयड और गलत एंटीबायोटिक दे देते हैं. इससे अक्सर दुधारू पशुओं की दूध देने की क्षमता खत्म हो जाती है या उनकी असामयिक मृत्यु हो जाती है.दूरदराज के इलाकों में ये फर्जी डॉक्टर सरकारी मुफ्त दवाओं के नाम पर भी पशुपालकों से हजारों रुपए वसूल रहे हैं.
बेपटरी होती ग्रामीण अर्थव्यवस्था
झारखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा पशुपालन पर टिका है. डॉक्टरों की कमी और झोलाछाप के बढ़ते प्रभाव से ‘लंपी’ और ‘खुरपका-मुंहपका’ जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है.
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