Chakradharpur: झारखंड के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में मनरेगा योजना और ‘लीड्स’ संस्था के साझा प्रयास अब धरातल पर रंग ला रहे हैं. बंदगांव प्रखंड की दो महिला मेटों मोनिका मुंडू और दशमा हेमब्रम ने अपनी मेहनत और सरकारी योजनाओं के कुशल क्रियान्वयन से न केवल अपनी अलग पहचान बनाई है, बल्कि आज वे सालाना लाखों रुपये की कमाई कर ग्रामीण विकास की नई इबारत लिख रही हैं.
मोनिका बनीं आत्मनिर्भरता की मिसाल
बंदगांव पंचायत की निवासी मोनिका मुंडू ने मनरेगा के तहत महिला मेट के रूप में कार्य करना शुरू किया. उन्होंने योजनाओं के प्रबंधन के साथ-साथ खुद को उद्यमिता से भी जोड़ा. आज मोनिका मुर्गी पालन के व्यवसाय से सालाना लगभग 1,20,000 रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा रही हैं. इसके अतिरिक्त वे आम बागवानी और गाय पालन जैसी योजनाओं का लाभ उठाकर अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को भी मजबूत कर रही हैं.

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दुर्गम क्षेत्र से निकली प्रेरणादायक कहानी
प्रखंड मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर दुर्गम घाटी क्षेत्र में रहने वाली दशमा हेमब्रम की कहानी भी उतनी ही प्रेरणादायक है. दशमा ने दो एकड़ जमीन में आम बागवानी की है, जिससे उन्हें सालाना करीब 70,000 रुपये की आय प्राप्त हो रही है. बागवानी के साथ-साथ वे सुअर पालन, मुर्गी पालन, गाय पालन और जैविक खाद उत्पादन जैसे कार्यों में भी सक्रिय हैं, जिसने उन्हें एक बहुआयामी उद्यमी के रूप में स्थापित किया है.
मनरेगा बना स्वावलंबन का आधार
इन दोनों महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि मनरेगा केवल मजदूरी का साधन नहीं, बल्कि स्वावलंबन का मजबूत आधार भी बन सकता है. ‘लीड्स’ संस्था के मार्गदर्शन और तकनीकी सहयोग ने उन्हें छोटे-बड़े कार्यों को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने में मदद की. अब ये दोनों महिलाएं न केवल खुद आत्मनिर्भर बन रही हैं, बल्कि गांव के अन्य ग्रामीणों को भी विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का काम कर रही हैं.
दूसरे जिलों के लिए बनी रोल मॉडल
यह सफलता की कहानी झारखंड के अन्य आकांक्षी जिलों के लिए भी एक रोल मॉडल बनकर उभरी है, जहां महिलाएं स्थानीय संसाधनों और सरकारी सहयोग के माध्यम से गरीबी को मात देकर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रही हैं.
