Ranchi : झारखंड मुक्ति मोर्चा ने राशन कार्ड रद्दीकरण के मुद्दे पर भाजपा को आड़े हाथों लेते हुए एक गंभीर डिजिटल साजिश का आरोप लगाया है. झामुमो ने तंज कसते हुए कहा कि पहले वोटर लिस्ट से नाम गायब करो, फिर राशन कार्ड कैंसिल करो और अंत में कह दो कि सब कुछ नियम के अनुसार हो रहा है. पार्टी के अनुसार, यह कोई तकनीकी चूक नहीं, बल्कि गरीब, मजदूर, दलित और आदिवासियों को सिस्टम से बाहर धकेलने का एक खतरनाक खेल है.
तकनीकी शब्दों की आड़ में हक पर डाका
झामुमो ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि बिहार में एसआइआर के बाद 35 लाख से ज्यादा राशन कार्ड रद्द किए जा चुके हैं. वहीं, पश्चिम बंगाल में 27 लाख लोगों के नाम काटने की कार्रवाई को लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी जैसे भारी-भरकम अंग्रेजी नाम का अमलीजामा पहना दिया गया. झामुमो का सीधा आरोप है कि सरकार गरीबों का हक छीनकर उसे तकनीकी शब्दों के पीछे छुपा रही है.
आंकड़ों का खेल और सियासी सवाल
- 90 लाख नाम कटे : विभिन्न राज्यों में मिलाकर कुल 90 लाख से अधिक नाम राशन सूची से हटा दिए गए हैं.
- 4 साल का लंबा इंतजार : कहा जा रहा है कि इस डेटा सुधार में 4 साल लगेंगे. यानी लाखों गरीब परिवार चार साल तक अनाज के लिए भटकते रहेंगे.
- रघुवर सरकार का जिक्र : झामुमो ने याद दिलाया कि इससे पहले झारखंड की पूर्व रघुवर दास सरकार ने भी बिना एसआइआर के 10 लाख राशन कार्ड कैंसिल कर दिए थे. आज नाम काटा जा रहा है, कल राशन रोका जाएगा और परसों कह दिया जाएगा कि डेटाबेस में आपका अस्तित्व ही नहीं है.
12 वर्षों में 12 हजार भी वापस क्यों नहीं
भाजपा के राष्ट्रीय नैरेटिव पर झामुमो ने कहा कि अब इन कटे हुए नामों को बांग्लादेशी बताकर सियासत की जाएगी. लेकिन सवाल यह है कि केंद्र और 22 राज्यों में सत्ता होने के बावजूद पिछले 12 सालों में ये 12 हजार घुसपैठियों को भी वापस क्यों नहीं भेज सके.
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