पूर्व सीएम चंपाई ने उठाए चर्चों की जमीन, डीलिस्टिंग और दोहरी पहचान पर सवाल, पूछा- ‘चर्च अल्पसंख्यक तो नौकरी-चुनाव में आदिवासी कैसे?’

Ranchi: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने राज्य में तेजी से बढ़ते धर्मांतरण और ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों को लेकर अब...

Ranchi: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने राज्य में तेजी से बढ़ते धर्मांतरण और ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों को लेकर अब तक का सबसे बड़ा और सीधा हमला बोला है. सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा करते हुए चंपाई सोरेन ने साफ कहा कि धर्मांतरण कोई सियासी एजेंडा नहीं, बल्कि झारखंड के मूल आदिवासियों के अस्तित्व और पहचान से जुड़ा बेहद संवेदनशील मामला है. उन्होंने दो टूक लहजे में कहा कि जो लोग धर्म बदलकर ईसाई बन चुके हैं, वे अल्पसंख्यक के लाभ भी ले रहे हैं और आदिवासियों के हक-अधिकारों पर भी डाका डाल रहे हैं. यह दोहरा रवैया अब और नहीं चलेगा.

यह भी पढ़ें: केंद्र की विफलताओं को छिपाने के लिए गढ़े जा रहे झूठे आंकड़े : झामुमो

चर्च अल्पसंख्यक संस्थान, तो आदिवासियों के आरक्षण पर कब्जा क्यों?

चंपाई सोरेन ने संविधान के अनुच्छेद 30 का हवाला देते हुए एक बड़ा कानूनी और सामाजिक सवाल खड़ा किया. उन्होंने कहा कि ईसाई समुदाय खुद को अल्पसंख्यक मानता है और उनके स्कूल-कॉलेज माइनॉरिटी संस्थान के रूप में चलते हैं. लेकिन हैरानी की बात है कि यही लोग चुनाव लड़ते समय या सरकारी नौकरी लेते समय अचानक आदिवासी बन जाते हैं. अगर आपने धर्म बदल लिया है, तो अपनी नई अल्पसंख्यक पहचान के साथ खुशी से रहिए, लेकिन आदिवासियों के आरक्षण और अधिकारों में अतिक्रमण बंद कीजिए.

चर्चों की जमीन और सीएनटी-एसपीटी एक्ट की जांच हो

उन्होंने भूमि हस्तांतरण के नियमों पर घेरते हुए कहा कि सीएनटी और एसपीटी एक्ट की कौन सी धारा आदिवासियों की जमीन को अल्पसंख्यकों को ट्रांसफर करने की इजाजत देती है? राज्य में बने हजारों चर्च विशुद्ध रूप से अल्पसंख्यक धार्मिक स्थल हैं. ये किसकी जमीन पर और किस कानून के तहत बनाए गए, इसकी गहन जांच होनी चाहिए.

मिशनरियों पर गंभीर आरोप

सनातनी समाज और आदिवासियों के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि हजारों सालों के सामाजिक सह-अस्तित्व में किसी भी मूलवासी या सनातनी ने आदिवासियों को लालच या धमकी देकर धर्म बदलने पर मजबूर नहीं किया. दिउड़ी और रंकिणी मंदिर जैसे उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यहां आज भी पाहन (आदिवासी पुजारी) पूजा कराते हैं और दोनों समाज एक-दूसरे की आस्था का सम्मान करते हैं. इसके विपरीत, उन्होंने ईसाई मिशनरियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पिछले 180 सालों में इन्होंने आदिवासियों की विशिष्ट संस्कृति पर गहरी चोट की है. सिमडेगा समेत झारखंड के कई हिस्सों में हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि धर्मांतरण के कारण गांवों के जाहेरस्थानों और सरना स्थलों पर ताले लग गए हैं, क्योंकि वहां अब पूजा करने वाला कोई नहीं बचा.

यह भी पढ़ें: चुनावी मूड में झारखंड कांग्रेस: प्रखंड अध्यक्षों के दम पर पंचायत चुनाव फतह करने की रणनीति, जून से ग्राउंड पर उतरेंगे दिग्गज

डीलिस्टिंग ही एकमात्र रास्ता

चंपाई सोरेन ने वैश्विक स्तर पर केन्या की संबुरु, ब्राजील की वाई वाई और लैटिन अमेरिका की अयोरेओ जनजाति का उदाहरण देते हुए कहा कि धर्मांतरण के बाद इन देशों में आदिवासी संस्कृतियां पूरी तरह विलुप्त हो गईं. भारत में भी आदिवासियों को मिटाने का यही खेल खेला जा रहा है. उन्होंने हिंदू बनाने के नैरेटिव को ईसाई मिशनरियों के दलालों का झूठा प्रचार करार दिया. उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा यूसीसी से आदिवासियों को बाहर रखने के फैसले का स्वागत किया और केंद्र सरकार से मांग की कि डीलिस्टिंग (अनुच्छेद 342 में संशोधन) के जरिए धर्म बदल चुके लोगों को आदिवासी सूची से बाहर कर इस संकट का स्थायी समाधान निकाला जाए.

सम्बंधित ख़बरें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *