VBU में वही चेहरे, बदलते सिर्फ पद: कुलाधिपति सचिवालय की मंशा पर भारी पड़ रहा ‘पद स्थायित्व’ का “खेल”

Hazaribagh: राज्य के विश्वविद्यालयों में वर्षों से एक ही व्यक्ति के विभिन्न प्रशासनिक पदों पर बने रहने की प्रवृत्ति पर लोकभवन की...

Hazaribagh: राज्य के विश्वविद्यालयों में वर्षों से एक ही व्यक्ति के विभिन्न प्रशासनिक पदों पर बने रहने की प्रवृत्ति पर लोकभवन की नजर है. इस संबंध में समय-समय पर निर्देश और पत्र भी जारी किए जाते रहे हैं, लेकिन विनोबा भावे विश्वविद्यालय में स्थिति कुछ अलग ही दिखाई देती है. यहां कई ऐसे चेहरे हैं जो वर्षों से विश्वविद्यालय प्रशासन के अहम पदों पर किसी न किसी रूप में बने हुए हैं. पद बदलते रहते हैं, लेकिन चेहरे वही रहते हैं.

लोकभवन का निर्देश, पर विभावि में अलग तस्वीर

कुलाधिपति सचिवालय ने हाल ही में विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक पदों पर लंबे समय तक जमे लोगों की समीक्षा का निर्देश दिया है. इसके बावजूद विभावि में वर्षों से कुछ चुनिंदा लोगों का प्रभाव कायम रहने को लेकर सवाल उठ रहे हैं.आलोचकों का कहना है कि विश्वविद्यालय में एक ऐसा समूह विकसित हो गया है जो शैक्षणिक गतिविधियों से अधिक प्रशासनिक पदों की राजनीति और जोड़-तोड़ में सक्रिय रहता है. परिणामस्वरूप नए और योग्य शिक्षकों को अवसर मिलने की संभावनाएं सीमित हो जाती हैं.

पद बदलते रहे, लेकिन प्रशासन में बने रहे वही चेहरे

विश्वविद्यालय प्रशासन में लंबे समय से सक्रिय प्रो. मिथिलेश सिंह इसका प्रमुख उदाहरण माने जा रहे हैं. वे अलग-अलग समय में प्रॉक्टर, सीसीडीसी, डीएसडब्ल्यू और रजिस्ट्रार जैसे महत्वपूर्ण पदों पर जिम्मेदारी निभाते रहे हैं. इसी प्रकार वर्तमान प्रभारी कुलसचिव वर्ष 2022 से वित्त पदाधिकारी के रूप में कार्यरत रहे और बाद में उन्हें प्रभारी कुलसचिव की जिम्मेदारी सौंप दी गई. प्रो. सादिक रज्जाक भी पहले कुलसचिव रहे. कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें प्रॉक्टर का दायित्व सौंप दिया गया. इससे यह धारणा मजबूत होती है कि प्रशासनिक पदों पर अवसरों का दायरा सीमित लोगों तक सिमट गया है.

खेल निदेशक बदले, लेकिन प्रशासनिक जिम्मेदारियां नहीं

विश्वविद्यालय में लंबे समय तक खेल निदेशक पद पर बने रहने के कारण प्रो. राखो हरि को हटाया गया था. हालांकि उनकी जगह जिन प्रोफेसर जॉनी रूफिना तिर्की को जिम्मेदारी दी गई, वे भी वर्षों से विभिन्न प्रशासनिक भूमिकाओं में सक्रिय रही हैं. जानकारों के अनुसार, वे कुलपति गुरदीप सिंह के कार्यकाल से लेकर अब तक एनएसएस समन्वयक, आर्ट एंड कल्चरल बोर्ड सहित कई प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन करती रही हैं. इस तरह करीब एक दशक से अधिक समय से वे प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बनी हुई हैं.

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यूआर और अन्य पदों पर भी सीमित चेहरों का दबदबा

विश्वविद्यालय से संबद्ध कई कॉलेजों में विश्वविद्यालय प्रतिनिधि (यूआर) जैसे पदों पर भी बार-बार उन्हीं लोगों की नियुक्ति किए जाने की चर्चा होती रही है. इससे यह सवाल उठता है कि क्या विश्वविद्यालय में प्रशासनिक जिम्मेदारियों के लिए पर्याप्त अवसरों का समान वितरण हो रहा है या नहीं. आलोचकों का मानना है कि एक सीमित समूह के प्रभाव के कारण अन्य शिक्षकों को नेतृत्व और प्रशासनिक अनुभव हासिल करने का अवसर नहीं मिल पाता.

लोकभवन के निर्देश के बाद बढ़ी निगाहें

इस पूरे मामले में सवाल सिर्फ विश्वविद्यालय प्रशासन पर ही नहीं, बल्कि लोकभवन पर भी उठ रहे हैं, क्योंकि अधिकांश महत्वपूर्ण मनोनयन और नियुक्तियों को अंतिम स्वीकृति वहीं से मिलती है. हाल ही में कुलाधिपति सचिवालय के अवर सचिव संजय कुमार द्वारा जारी पत्र में सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और कुलसचिवों को विश्वविद्यालय प्रतिनिधियों सहित विभिन्न प्रशासनिक पदों पर कार्यरत व्यक्तियों के कार्यकाल की समीक्षा करने का निर्देश दिया गया है. पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “निर्धारित कार्यकाल समाप्त होने के बाद एक ही व्यक्ति का लंबे समय तक विभिन्न प्रशासनिक पदों पर बने रहना सर्वथा अनुचित तथा नियमसम्मत नहीं माना जा सकता.”

अब सबकी नजर कार्रवाई पर

कुलाधिपति सचिवालय के इस ताजा निर्देश का विभावि में कितना प्रभाव पड़ता है, यह आने वाला समय तय करेगा. फिलहाल विश्वविद्यालय में वर्षों से एक ही चेहरे के अलग-अलग पदों पर बने रहने की व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है और शिक्षकों के बीच भी समान अवसर की मांग जोर पकड़ने लगी है.

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