Ranchi: झारखंड राज्यसभा चुनाव के ऐलान के साथ ही प्रदेश भाजपा के सूरमाओं ने जो सियासी माहौल बनाया था, वह नामांकन के आखिरी दिन तक आते-आते पूरी तरह फुस्स हो गया. प्रतिपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी ने घोषणा की थी कि भाजपा न केवल अपना प्रत्याशी देगी, बल्कि उसे जिताकर दिल्ली भी भेजेगी. उनके सुर में सुर मिलाते हुए प्रदेश अध्यक्ष प्रो. आदित्य साहू ने भी माटी पुत्र का कार्ड खेलते हुए दावा किया था कि उम्मीदवार शत-प्रतिशत स्थानीय ही होगा. लेकिन, जब दिल्ली से स्क्रिप्ट फाइनल हुई, तो इन दावों की धज्जियां उड़ गईं. खुद को अनुशासित और मजबूत बताने वाली पार्टी ने मैदान में उतरने से पहले ही घुटने टेक दिए.
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गौरव वल्लभ की पॉलिटिकल रैगिंग
भाजपा ने इस चुनाव में सिर्फ अपने दावों की बलि नहीं दी, बल्कि प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य गौरव वल्लभ को भी पॉलिटिकल बलि का बकरा बना दिया. दिल्ली दरबार के करीब रहने वाले वल्लभ को पार्टी ने ऐसा उलझाया कि वे खुद भाजपा से ज्यादा कॉन्फिडेंट नजर आ रहे थे. तभी तो बिना किसी आधिकारिक घोषणा के उन्होंने एडवांस में नामांकन पत्र भी खरीद लिया. खेल का सबसे दिलचस्प अध्याय 7 जून की रात को लिखा गया. वल्लभ को बकायदा उस बैठक में बुलाया गया, जहां भाजपा विधायकों से प्रस्तावक के रूप में दस्तखत कराए जा रहे थे. लेकिन राजनीति के इस अर्थशास्त्री को तब बड़ा झटका लगा जब उन्होंने देखा कि उस पर्चे पर उनका नाम गायब था. सोमवार सुबह होते ही जब इस पॉलिटिकल रैगिंग और अपमान का दर्द बर्दाश्त से बाहर हुआ, तो वे भाजपा मुख्यालय जाने के बजाय सीधे दिल्ली लौट गए.
जब नाथवानी ने भरी उड़ान, तब खत्म हुआ गौरव वल्लभ का खेल
इस पूरी सियासी पटकथा के पीछे कॉरपोरेट मैनेजमेंट का वो अंडरकरंट था, जिसे गौरव वल्लभ जैसा पढ़ा-लिखा नेता भी नहीं भांप सका. शनिवार की रात निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी चुपचाप मुख्यमंत्री से मिलते हैं और सीधे दिल्ली के लिए उड़ान भरते हैं. जब तक नाथवानी दिल्ली में रहे, झारखंड भाजपा आलाकमान के निर्देश का बहाना बनाकर मौन साधे रही. लेकिन, जैसे ही नाथवानी का विमान दिल्ली से रांची के लिए टेक-ऑफ हुआ, वैसे ही झारखंड भाजपा के सारे दावे मटियामेट हो गए और गौरव वल्लभ का पत्ता साफ हो गया. सियासी गलियारों में चर्चा है कि संभवतः भाजपा ने वल्लभ को केवल एक डमी मोहरे के रूप में इस्तेमाल करने के लिए रांची भेजा था, ताकि असली रणनीति पर पर्दा डाला जा सके.

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किस गुनाह की मिली सजा
देश-दुनिया को आर्थिक मंदी और विकास के आंकड़े समझाने वाले गौरव वल्लभ को अब समझ आ गया होगा कि सियासत का गणित किसी भी किताब से नहीं पढ़ाया जा सकता. सियासी गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि भाजपा ने अपने ही कद्दावर नेता को इस कदर तड़पाकर आखिर किस जन्म का बदला लिया है. झारखंड की इस राज्यसभा बिसात ने साफ कर दिया है कि भाजपा के स्थानीय नेताओं के दावे केवल मीडिया की सुर्खियों के लिए होते हैं. जब बात कॉरपोरेट लॉबिंग और बड़े सियासी समीकरणों की आती है, तो माटी और स्थानीयता के नारे को ठंडे बस्ते में डालकर किसी निर्दलीय के पीछे खड़ा होने में भी पार्टी को गुरेज नहीं होता.
