Hazaribagh: सात दशक से भूमि स्वामित्व और दाखिल-खारिज की जटिल प्रक्रिया में उलझे कोनार डीवीसी विस्थापित परिवारों के लिए आज का दिन नई उम्मीद लेकर आया. वर्षों से अपनी जमीन के अधिकार के लिए भटक रहे सैकड़ों परिवारों को पहली बार लगा कि उनकी समस्याओं के समाधान की दिशा में प्रशासन गंभीरता से पहल कर रहा है.
डीवीसी कोनार स्थित सीएसआर कार्यालय में आयोजित विशेष संवाद
कार्यक्रम में विष्णुगढ़ के अंचल अधिकारी नित्यानंद दास ने विस्थापित रैयतों से सीधा संवाद किया. इस दौरान उन्होंने न केवल उनकी समस्याएं सुनीं, बल्कि भूमि हस्तांतरण और दाखिल-खारिज की पूरी प्रक्रिया को सरल भाषा में समझाकर लोगों की शंकाओं का समाधान भी किया.

दशकों से झेल रहे हैं भूमि संबंधी परेशानी
कोनार डैम निर्माण के बाद विस्थापित हुए अनेक परिवार वर्षों से भूमि के स्वामित्व, दाखिल-खारिज और राजस्व अभिलेखों से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं. कई परिवारों के पास जमीन तो है, लेकिन कागजी प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण वे सरकारी योजनाओं और कानूनी अधिकारों से वंचित हैं. भूमि खरीद-बिक्री, उत्तराधिकार, वंशावली और जमाबंदी से जुड़े मामलों में स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं मिलने के कारण लोगों को बार-बार कार्यालयों का चक्कर लगाना पड़ता रहा है. ऐसे में यह संवाद कार्यक्रम उनके लिए राहत का संदेश लेकर आया.
अंचल कार्यालय के आदेश पर आयोजित हुआ विशेष संवाद
अंचल कार्यालय के आदेश पत्रांक-410, दिनांक 10 जून 2026 के आलोक में आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विस्थापित परिवारों ने भाग लिया. कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य वर्षों से लंबित भूमि मामलों के निष्पादन को लेकर लोगों को जागरूक करना और प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना था. सीओ नित्यानंद दास ने कहा कि प्रशासन की प्राथमिकता है कि किसी भी पात्र रैयत को उसके अधिकार से वंचित न रहना पड़े और सभी मामलों का निष्पादन नियमसम्मत एवं पारदर्शी तरीके से किया जाए.
भूमि हस्तांतरण के लिए किन दस्तावेजों की होगी जरूरत
संवाद के दौरान अंचल अधिकारी ने बताया कि भूमि संबंधी मामलों के निष्पादन के लिए रैयतों को मूल दस्तावेजों के साथ आवश्यक अभिलेख प्रस्तुत करने होंगे.उन्होंने कहा कि कार्यपालक दंडाधिकारी स्तर से शपथ-पत्र देना अनिवार्य होगा, जिसमें डीवीसी द्वारा आवंटित भूमि का विवरण, खाता एवं प्लॉट संख्या,भूमि का रकबा, जमाबंदी रैयत का नाम, भूमि की खरीद-बिक्री से जुड़ी जानकारी स्पष्ट रूप से अंकित करनी होगी. उन्होंने कहा कि सही दस्तावेज उपलब्ध होने पर मामलों के निष्पादन में तेजी लाई जाएगी.
ग्रामसभा के जरिए तैयार होगी वंशावली
सीओ ने बताया कि प्रक्रिया को व्यवस्थित और पारदर्शी बनाने के लिए संबंधित गांवों में ग्रामसभा आयोजित की जाएगी. ग्रामसभा के माध्यम से मुखिया द्वारा विस्थापित परिवारों की वंशावली तैयार कर राजस्व अभिलेखों के साथ जमा की जाएगी. प्रशासन का मानना है कि इससे वास्तविक उत्तराधिकारियों की पहचान सुनिश्चित होगी और वर्षों से लंबित भूमि हस्तांतरण संबंधी मामलों को सुलझाने में मदद मिलेगी.
जब अधिकारियों ने सुनी जनता की बात
कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि अंचल अधिकारी ने मंचीय भाषण तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि लोगों के बीच बैठकर उनकी समस्याएं सुनीं. भूमि, दाखिल-खारिज, वंशावली, खरीद-बिक्री और राजस्व अभिलेखों से जुड़े सवालों पर खुलकर चर्चा हुई. कई रैयतों ने व्यक्तिगत समस्याएं भी रखीं, जिन पर सीओ ने विस्तार से जवाब दिया. इस संवाद ने प्रशासन और जनता के बीच मौजूद दूरी को कम करने का काम किया.
“पहली बार लगा कि हमारी बात सुनी जा रही है”
कार्यक्रम में मौजूद कई विस्थापितों ने कहा कि वर्षों से वे अपनी समस्याओं के समाधान के लिए भटक रहे हैं, लेकिन पहली बार किसी अधिकारी ने इतनी गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ उनकी बात सुनी है. लोगों का कहना था कि यदि प्रशासन इसी प्रकार निरंतर संवाद बनाए रखे और प्रक्रियाओं को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाए, तो दशकों से लंबित भूमि स्वामित्व का मामला जल्द सुलझ सकता है.
संघर्ष मोर्चा के प्रतिनिधि भी रहे मौजूद
कार्यक्रम में विस्थापित संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष सुशील कुमार महतो, सचिव सुरेश राम, उपाध्यक्ष हीरामन महतो, संरक्षक एवं पूर्व मुखिया कैलाश महतो सहित बड़ी संख्या में विस्थापित परिवारों के सदस्य उपस्थित रहे. प्रतिनिधियों ने भी प्रशासनिक पहल का स्वागत करते हुए कहा कि संवाद और सहयोग के माध्यम से लंबे समय से लंबित समस्याओं का समाधान संभव है.
उम्मीदों के साथ समाप्त हुआ संवाद कार्यक्रम
कार्यक्रम के अंत में भारत माता की जय और वंदे मातरम् के नारों से पूरा परिसर गूंज उठा. लोगों के चेहरों पर वर्षों पुरानी समस्या के समाधान की उम्मीद साफ दिखाई दे रही थी. विस्थापित परिवारों का मानना है कि यदि प्रशासन और जनता के बीच शुरू हुआ यह संवाद लगातार जारी रहा, तो कोनार विस्थापितों की 70 वर्षों पुरानी भूमि संबंधी समस्या का स्थायी समाधान अब दूर नहीं होगा. यह पहल केवल भूमि विवाद के निपटारे की दिशा में कदम नहीं, बल्कि प्रशासन और जनता के बीच विश्वास की नई नींव भी साबित हो सकती है.
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