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सरकारी स्कूलों में तैयारी उड़ान की: प्रोजेक्ट ‘परख’ से बदल रहा पश्चिमी सिंहभूम का शैक्षणिक परिवेश

हंसी-खुशी और अनुशासन के बीच बढ़ा बच्चों का आत्मविश्वास, झिझक मिटाने को चल रहा ‘बात तो करनी होगी’ और ‘बोलेगा सिंहभूम’ अभियान...

  • हंसी-खुशी और अनुशासन के बीच बढ़ा बच्चों का आत्मविश्वास, झिझक मिटाने को चल रहा ‘बात तो करनी होगी’ और ‘बोलेगा सिंहभूम’ अभियान

Ranchi: आमतौर पर सरकारी स्कूलों की जो घिसी-पिटी छवि दिमाग में आती है, पश्चिमी सिंहभूम जिला प्रशासन उसे पूरी तरह बदलने में जुटा है. जिले के सरकारी विद्यालयों में इन दिनों बदलाव की एक नई इबारत लिखी जा रही है, जिसका नाम है— “प्रोजेक्ट परख: तैयारी उड़ान की”. जिला प्रशासन की इस अनूठी और नवाचार आधारित पहल से न सिर्फ स्कूलों की शैक्षणिक गुणवत्ता सुधरी है, बल्कि बच्चों के भीतर का डर और झिझक भी गायब हो रही है. हंसी-खुशी और अनुशासित माहौल का ही असर है कि अब स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति और पढ़ाई के प्रति उनकी सहभागिता में भारी उछाल आया है.

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15 जून को स्कूलों में मनेगा सामूहिक ‘बर्थडे’, मिलेगी कृमि की दवा

प्रोजेक्ट परख के तहत स्कूलों में शुरू किया गया ‘तिथि भोज-सह-जन्मोत्सव’ कार्यक्रम बच्चों के आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है. इसी कड़ी में आगामी 15 जून को राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस के मौके पर जिले के सभी स्कूलों में सामूहिक जन्मोत्सव और तिथि भोज का आयोजन होगा. इसके साथ ही सभी आंगनबाड़ी केंद्रों में ‘बाल भोज’ सजेगा. इस दौरान बच्चों को स्वादिष्ट भोजन के साथ-साथ पेट के कीड़ों से बचाव के लिए कृमि मुक्ति की दवा (एल्बेंडाजोल) दी जाएगी और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जाएगा.

खेल, कला और संवाद से निखर रहीं प्रतिभाएं

यह प्रोजेक्ट सिर्फ किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों के सर्वांगीण विकास पर केंद्रित है.

‘बोलेगा सिंहभूम’ से कटी मंच की झिझक: ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चों के मन से स्टेज का डर निकालने के लिए “बात तो करनी होगी” और “बोलेगा सिंहभूम” जैसे विशेष डिबेट और पब्लिक स्पीकिंग सेशन चलाए जा रहे हैं. इससे बच्चों का कम्युनिकेशन स्किल मजबूत हो रहा है.

हर महीने खेल महोत्सव: ‘एक्टिविटी ऑफ द मंथ’ और खेल महोत्सव के जरिए वाद-विवाद, रचनात्मक लेखन, विज्ञान गतिविधि और खेलकूद में बच्चों की लीडरशिप और टीमवर्क की भावना को निखारा जा रहा है.

नियमित टेस्ट से सुधरा लर्निंग लेवल: स्कूलों में अब रटने की बजाय सीखने पर जोर है. इसके लिए लगातार जांच परीक्षाएं हो रही हैं, जिससे कमजोर बच्चों की पहचान कर उन्हें एक्स्ट्रा सपोर्ट दिया जा रहा है.

पेरेंट्स-टीचर मीटिंग : प्राइवेट स्कूलों की तर्ज पर अब सरकारी स्कूलों में भी नियमित अभिभावक-शिक्षक बैठकें हो रही हैं, जिससे ग्रामीण अभिभावक भी अपने बच्चों की पढ़ाई को लेकर गंभीर हुए हैं.

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