Ranchi: झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य के सेवा कानूनों और कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक नजीर पेश की है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि विभाग की गलत और अवैध कार्रवाई का खामियाजा किसी भी कर्मचारी को नहीं भुगतना पड़ेगा.
2017 में हुई थी बर्खास्तगी
हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने सड़क निर्माण विभाग के कर्मचारी अमरेश कुमार झा को बड़ी राहत देते हुए विभाग के उस मनमाने आदेश को रद्द कर दिया है जिसके तहत उनकी बर्खास्तगी अवधि को नो वर्क नो पे घोषित कर बकाया वेतन और अन्य लाभों पर रोक लगा दी गई थी. यह पूरा कानूनी विवाद वर्ष 2017 से शुरू हुआ था. जब सड़क निर्माण विभाग ने 13 नवंबर 2017 को अमरेश कुमार झा को सेवा से बर्खास्त कर दिया था. इस एकतरफा कार्रवाई को उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी.

2021 में बर्खास्तगी को बताया गया अवैध
जिसके बाद वर्ष 2021 में हाई कोर्ट ने इस बर्खास्तगी को अवैध पाते हुए रद्द कर दिया और उन्हें सेवा में पुनर्बहाली का निर्देश दिया.राज्य सरकार ने इस फैसले के खिलाफ पहले हाईकोर्ट में अपील की उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. लेकिन सरकार की अपीलें हर जगह खारिज हो गईं. शीर्ष अदालत में हारने के बाद विभाग ने नवंबर 2023 में अमरेश झा को सेवा में वापस तो ले लिया लेकिन उनकी 6 साल की बर्खास्तगी अवधि (2017 से 2023) को नो वर्क नो पे घोषित कर बैक वेज देने से इनकार कर दिया.
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पुनर्बहाली के बाद भी नहीं मिला छह साल का वेतन
हाईकोर्ट कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब मूल बर्खास्तगी आदेश ही अवैध था तो कानूनन यह माना जाएगा कि कर्मचारी कभी सेवा से बाहर गया ही नहीं था और लगातार अपनी ड्यूटी पर था. कर्मचारी काम पर इसलिए नहीं आ सका क्योंकि विभाग ने उसे अवैध रूप से हटा दिया था. ऐसी स्थिति में नो वर्क नो पे का सिद्धांत कतई लागू नहीं होता.


