Ranchi: राज्य सभा का चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प और त्रिकोणीय मोड़ पर आ खड़ा हुआ है. एक तरफ जहां मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अगुवाई में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) और कांग्रेस का सत्तारूढ़ महागठबंधन दोनों सीटों पर अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए अभेद्य चक्रव्यूह तैयार कर चुका है, वहीं दूसरी तरफ मैदान में हैं देश के दिग्गज कारोबारी और तीन बार के राज्यसभा सांसद परिमल नथवानी. रिलायंस समूह से जुड़े नथवानी की सबसे बड़ी यूएसपी उनका कभी न हारने का रिकॉर्ड है, जिसे वे चौथी बार भी बरकरार रखने के इरादे से निर्दलीय मैदान में उतरे हैं.
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साख और रणनीति की अंतिम परीक्षा
यह चुनाव अब सिर्फ दो सीटों का नहीं, बल्कि साख की लड़ाई बन चुका है. क्या परिमल नथवानी अपने पुराने अनुभवों, रणनीतिक कौशल और परदे के पीछे की सियासी गोटियों के दम पर एक बार फिर इतिहास रच पाएंगे? या फिर सीएम हेमंत सोरेन और कांग्रेस का यह एकजुट किला नथवानी के अजेय रथ को रोकने में कामयाब रहेगा? इसका फैसला विधायकों के वोट और भविष्य के गर्भ में छिपा है.
क्या नाथवाणी चौथी बार जीतकर रचेंगे इतिहास?
परिमल नथवानी के सियासी सफर की शुरुआत 2008 में झारखंड की धरती से ही हुई थी, जब उन्होंने निर्दलीय लड़कर आरजेडी और अन्य दलों के समर्थन से जीत दर्ज की थी. इसके बाद 2014 में वे बीजेपी-आजसू के समर्थन से निर्विरोध चुने गए और 2020 में आंध्र प्रदेश से वाईएसआर कांग्रेस के टिकट पर संसद पहुंचे. अब 2026 में वे एक बार फिर झारखंड की पिच पर हैं और उन्हें बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए का पूरा समर्थन हासिल है.
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महागठबंधन का एकजुट दांव और नंबर गेम
हालांकि, इस बार नथवानी की राह 2008 जितनी आसान नहीं दिखती. जीत के लिए उन्हें एनडीए के अलावा 4 अतिरिक्त वोटों की दरकार है. दूसरी ओर, महागठबंधन पूरी तरह सतर्क और आक्रामक है. कांग्रेस नेता राजेश ठाकुर का दावा है कि उनके पास 62 विधायकों का मजबूत और एकजुट समर्थन है. किसी भी तरह की चूक से बचने के लिए सत्ता पक्ष के विधायकों की ‘मॉक ड्रिल’ तक कराई गई है, ताकि कोई वोट अवैध न हो. विधायक कुमार जयमंगल का कहना है कि भाजपा के पास अपना उम्मीदवार तक नहीं था, इसलिए उन्हें एक निर्दलीय को बैसाखी बनाना पड़ा. वहीं नमन विक्सल कोंगाड़ी और प्रदीप यादव जैसे विधायकों ने साफ किया कि उनके खेमे में कोई भ्रम नहीं है और सभी विधायक एकजुट हैं.



