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स्कूल तक पहुंच आसान, लेकिन टिकना मुश्किल, झारखंड की शिक्षा व्यवस्था का दूसरा सच

Ranchi: झारखंड में शिक्षा का दायरा तेजी से बढ़ा है. स्कूलों की संख्या बढ़ी, नामांकन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा और सरकारी योजनाओं...

School Students
एआई इमेज

Ranchi: झारखंड में शिक्षा का दायरा तेजी से बढ़ा है. स्कूलों की संख्या बढ़ी, नामांकन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा और सरकारी योजनाओं ने लाखों बच्चों को स्कूल की चौखट तक ला खड़ा किया. लेकिन असली लड़ाई अब शुरू होती है बच्चों को स्कूल में बनाए रखने की. ताजा आंकड़े एक दिलचस्प लेकिन चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं. एक तरफ सरकार दावा कर रही है, कि ड्रॉपआउट दर में बड़ी गिरावट आई है. वहीं दूसरी ओर जैसे-जैसे कक्षाएं ऊपर जाती हैं, बच्चों की संख्या तेजी से कम होती जाती है. यानी स्कूल में दाखिला तो हो रहा है, लेकिन पढ़ाई बीच में छूट रही है.

ऊंची कक्षाओं में क्यों खाली हो रही बेंच?

रांची जिले के आंकड़े इस हकीकत को साफ कर देते हैं. प्राथमिक कक्षाओं में जहां लाखों बच्चे पढ़ रहे हैं, वहीं 9वीं से 12वीं तक पहुंचते-पहुंचते यह संख्या काफी घट जाती है. यह गिरावट बताती है कि सिस्टम बच्चों को शुरुआत में तो जोड़ रहा है, लेकिन आगे संभाल नहीं पा रहा.

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आंकड़ों की चमक बनाम जमीनी सच्चाई

सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, ड्रॉपआउट दर अब काफी कम हो चुकी है. प्राथमिक स्तर पर 2% से भी नीचे और माध्यमिक स्तर पर करीब 3.5%. लेकिन सच यह है कि यह तस्वीर पूरी नहीं है. कई बच्चे नामांकन तो करवा लेते हैं, लेकिन नियमित रूप से स्कूल नहीं जाते या फिर चुपचाप पढ़ाई छोड़ देते हैं.

गरीबी, दूरी और मजबूरी—तीन बड़ी दीवारें

ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में बच्चों के लिए स्कूल तक पहुंच अब भी आसान नहीं है. कई जगहों पर स्कूल दूर हैं, परिवहन की सुविधा नहीं है और आर्थिक दबाव के कारण बच्चों को काम पर लगना पड़ता है. पलायन और बाल श्रम जैसी समस्याएं भी पढ़ाई में सबसे बड़ी बाधा बन रही हैं.

लड़कियों की पढ़ाई पर सबसे ज्यादा असर

शुरुआती कक्षाओं में लड़कियां आगे रहती हैं, लेकिन हाई स्कूल तक पहुंचते-पहुंचते उनकी संख्या तेजी से घटती है. कम उम्र में शादी, सुरक्षा की चिंता और घरेलू जिम्मेदारियां उनकी पढ़ाई रोक देती हैं. यानी शिक्षा में लैंगिक अंतर अब भी गहराई से मौजूद है.

सरकार की कोशिशें—क्या बदल पाएंगी तस्वीर?

राज्य सरकार ने ‘स्कूल रूआर 2026’ जैसे अभियानों के जरिए ड्रॉपआउट बच्चों को फिर से स्कूल लाने की मुहिम तेज की है. हजारों बच्चों की पहचान कर उन्हें दोबारा नामांकित किया गया है. ‘डहर 2.0’ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म से भी इस प्रक्रिया को मजबूत किया जा रहा है. लेकिन सवाल अब भी कायम है, कि क्या सिर्फ नामांकन बढ़ाने से शिक्षा मजबूत हो जाएगी?

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