Ranchi: झारखंड के जंगलों को हरा-भरा बनाने और पर्यावरण संरक्षण के नाम पर मिलने वाली केंद्र सरकार की बड़ी राशि कैंपा फंड राज्य में सफेद हाथी साबित हो रही है. केंद्र द्वारा हर साल करोड़ों रुपए भेजे जा रहे हैं, लेकिन राज्य सरकार की लचर कार्यप्रणाली और विभागीय उदासीनता के कारण यह राशि विकास के काम में खर्च होने के बजाय सरकारी फाइलों की फाइलों में ही दबी रह जा रही है. पिछले छह वर्षों के आंकड़े बता रहे हैं कि किस तरह झारखंड के वनों के हिस्से का धन हर साल सरेंडर हो रहा है.
कैंपा फंड का उद्देश्य क्या था और क्या हो रहा है
कम्पेन्सेटरी अफोरेस्टेशन फंड मैनेजमेंट एंड प्लानिंग अथॉरिटी’ (कैंपा) का मूल उद्देश्य वनीकरण, वन्यजीव प्रबंधन, पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार और जंगल के आसपास रहने वाले समुदायों के जीवन स्तर को बेहतर बनाना है. लेकिन झारखंड में यह पैसा वनों के संरक्षण के बजाए केवल कागजों पर ही सिमट कर रह गया है.

खर्च कम, सरेंडर ज्यादा
- 2019-20 और 2020-21: इन दोनों वर्षों में राज्य को 399.29 करोड़ रुपए मिले. हर साल मात्र 223.57 करोड़ ही खर्च हो पाए, जबकि 175.72 करोड़ रुपए प्रति वर्ष वापस लौट गए.
- 2021-22: इस वर्ष 437.62 करोड़ रुपए मिले, जिसमें से मात्र 240.98 करोड़ का ही सदुपयोग हुआ और 196.64 करोड़ रुपए खर्च ही नहीं हो पाए.
- 2022-23: बजट बढ़कर 764.85 करोड़ हो गया, लेकिन खर्च का ग्राफ नहीं बदला. मात्र 316.46 करोड़ खर्च हुए और 448.39 करोड़ का फंड बिना उपयोग के रह गया.
- 2023-24: इस वर्ष 412.14 करोड़ रुपए मिले, जिसमें से 213.04 करोड़ खर्च हुए और 199.1 करोड़ रुपए की राशि का कोई इस्तेमाल नहीं हुआ.
- 2024-25: 654.62 करोड़ रुपए की बड़ी राशि मिली, लेकिन विडंबना यह है कि मात्र 275.78 करोड़ खर्च हो सके और 378.84 करोड़ रुपए का भारी-भरकम बजट बिना खर्च किए ही धरा रह गया.
भविष्य पर संकट के बादल
वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए 2001.13 करोड़ रुपए का भारी-भरकम प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन पिछले वर्षों के खराब ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए केंद्र ने इस पर मंजूरी देने से ही इनकार कर दिया. वहीं, अब 2026-27 के लिए 1777.93 करोड़ रुपए प्रस्तावित हैं, जिस पर अब तक स्वीकृति का ग्रहण लगा हुआ है.


