Manish Bhardwaj
Ranchi : झारखंड की सियासत में ऊपर से दिखने वाली ऑल इज वेल की चादर के नीचे एक ऐसी कड़वी हकीकत दबी है, जिसे समझने की कोशिश करेंगे तो आप उलझ कर रह जाएंगे. राज्य में गठबंधन की सरकार तो चल रही है, लेकिन इस सरकार की सबसे बड़ी साझेदार यानी कांग्रेस के भीतर जो कुछ चल रहा है, वह पार्टी के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान खड़ा कर रहा है. अंतर्कलह और आत्मसमर्पण की हद यह है कि कांग्रेस अपनी जीती-जिताई राज्यसभा सीट तक गंवा बैठी, लेकिन शीर्ष नेतृत्व धृतराष्ट्र बना बैठा है.

समन्वय समिति का पेंच फंसा
पार्टी के ही एक बड़े नेता ने जो खुलासा किया है, वह चौंकाने वाला है. करीब 6-7 महीने पहले कांग्रेस ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को समन्वय समिति बनाने के लिए बकायदा एक आधिकारिक चिट्ठी सौंपी थी. कांग्रेस ने इस समिति के लिए अपनी तरफ से 3 नाम दिए थे. सूत्र बताते हैं कि जिन तीन नेताओं के नाम भेजे गए हैं, झारखंड मुक्ति मोर्चा उनसे खुश नहीं है.
कांग्रेस के बड़े नेताओं का नाम लिस्ट से गायब
जेएमएम से बेहद मधुर और करीबी रिश्ता रखने वाले कांग्रेस के कद्दावर नेताओं का नाम ही इस लिस्ट से गायब कर दिया गया. यह कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी का नतीजा है. जिसने समन्वय समिति को ठंडे बस्ते में डाल दिया और आज तक इसका गठन नहीं हो सका.
बयानों की बगावत और नेतृत्व की लाचारी
कांग्रेस में अनुशासन का क्या स्तर है, इसे दो बड़े उदाहरणों से समझा जा सकता है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रदीप बलमुचू राज्यसभा चुनाव में मिली करारी हार के लिए खुलेआम और लगातार जेएमएम को दोषी ठहरा रहे हैं. सरकार पर हमलावर हैं, लेकिन पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उन पर कोई एक्शन लेने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है. दूसरी तरफ पूर्व विधायक योगेंद्र साव हैं. जिन्होंने जेएमएम और हेमंत सोरेन को भला-बुरा कहा. लेकिन कांग्रेस ने नियमों को ताक पर रखकर उन्हें फिर से पार्टी में शामिल कर लिया.
सिद्धांत विहीन राजनीति और वजूद का संकट
वर्तमान में, झारखंड कांग्रेस की स्थिति यह हो गई है कि जिस नेता को जहां अपना निजी फायदा दिखता है, वह वहीं यू-टर्न ले लेता है. पार्टी के उसूल, नियम और विचारधारा अब सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गए हैं. शीर्ष नेताओं ने एक अजीब सी चुप्पी साध रखी है. यह चुप्पी किसी रणनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि लाचारी की निशानी है. यही कारण है कि कांग्रेस धीरे-धीरे राज्य में अपना जनाधार और अस्तित्व खोती जा रही है.
कुर्सी के लिए सब कुछ मंजूर
राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि झारखंड कांग्रेस सत्ता का सुख भोगने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है. ऐसा लगता है कि सरकार में बने रहने के लिए पार्टी झूठा खाना खाने (बेइज्जती सहने) को भी तैयार है. सहयोगी दल चाहे जितना भी अपमानित कर लें, आंखें दिखा लें, लेकिन मलाईदार कुर्सियों का मोह ऐसा है कि कांग्रेस के नेता सब कुछ खुशी-खुशी सहने को अभिशप्त हैं. अगर यही हाल रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब झारखंड में कांग्रेस सिर्फ इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी.


