Ranchi: मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री के बाद अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक भावुक और तर्कपूर्ण पत्र लिखकर जनगणना 2027 में आदिवासियों के लिए पृथक ‘सरना धर्म कोड’ की मांग की है. मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति को समाज के अभिभावक और संवैधानिक संरक्षक के रूप में संबोधित करते हुए इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है. मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि जनगणना केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं, बल्कि किसी समुदाय की अस्मिता और उसके भविष्य की नीतियों का आधार है.
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राष्ट्रपति की संवैधानिक भूमिका पर जोर
सीएम सोरेन ने अपने पत्र में राष्ट्रपति को उनके विशेष उत्तरदायित्वों की याद दिलाते हुए कहा कि संविधान की धारा 244, 338A, 339 और 275 उन्हें आदिवासियों के हितों की रक्षा का अधिकार देती हैं. उन्होंने लिखा कि देश के सर्वोच्च पद पर आसीन एक जनजातीय प्रतिनिधि होने के नाते, पूरा आदिवासी समाज उन्हें अपनी आशा की किरण के रूप में देख रहा है. मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति से अनुरोध किया कि वे केंद्र सरकार को जनगणना के दूसरे चरण में सरना धर्म (या अन्य सदृश धार्मिक व्यवस्था) के लिए अलग कोड निर्धारित करने का निर्देश दें.
तथ्य आधारित प्रशासन
सीएम ने तर्क दिया कि यदि आंकड़ों का सही संकलन नहीं हुआ, तो आदिवासी समाज के लिए बनाई जाने वाली कल्याणकारी योजनाओं और नीति निर्धारण पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. पत्र में जिक्र है कि आजादी से पहले आदिवासियों की धार्मिक विशिष्टता दर्ज होती थी, लेकिन स्वतंत्र भारत में यह परंपरा खत्म कर दी गई. सरना धर्म की विशिष्ट पूजा पद्धति और प्रकृति प्रेम इसे एक अलग धार्मिक पहचान देते हैं. सीएम ने कहा कि जब भारत डिजिटल क्षेत्र में अग्रणी है, तो तकनीक के माध्यम से एक नया धार्मिक कोड जोड़ना और सटीक आंकड़े जुटाना बेहद आसान है.
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2011 में 50 लाख लोगों ने खुद दर्ज कराया था नाम
मुख्यमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि 2011 की जनगणना में, बिना किसी आधिकारिक कोड के भी, 21 राज्यों के लगभग 50 लाख लोगों ने ‘अन्य’ कॉलम में अपनी इच्छा से “सरना” अंकित किया था. यह इस समाज के अपने धर्म और संस्कृति के प्रति अटूट विश्वास का प्रमाण है. जनगणना मात्र आंकड़ों की गणना नहीं है, यह आंकड़ों की गहराई का विश्लेषण है. किसी समाज की पहचान उसकी सांस्कृतिक और धार्मिक विशेषताओं से होती है, और सरना कोड इसी पहचान को बरकरार रखने की मांग है.
