Ranchi : झारखंड में सरना धर्म कोड की मांग अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बाद अब राज्य के संवैधानिक प्रमुख, राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार को भी पत्र लिखा है. इस पत्र में सीएम ने राज्यपाल से आग्रह किया है कि वे जनगणना 2027 में आदिवासियों के लिए पृथक धार्मिक पहचान सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार के समक्ष मजबूत अनुशंसा करें. मुख्यमंत्री ने इस पत्र के जरिए एक नया संवैधानिक एंगल दिया है, जिसमें उन्होंने राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों का संरक्षक बताते हुए उनकी विशेष शक्तियों का उल्लेख किया है.
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राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों के इस्तेमाल का आह्वान
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पत्र में विशेष रूप से संविधान की धारा-244 और पांचवीं अनुसूची का जिक्र किया. उन्होंने राज्यपाल को याद दिलाया कि अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए राज्यपाल पर विशेष उत्तरदायित्व होता है. सीएम ने कहा कि झारखंड जैसे राज्य के लिए राज्यपाल की भूमिका केवल एक प्रशासनिक प्रमुख की नहीं, बल्कि एक अभिभावक की है, जो आदिवासी अस्मिता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है.
सेल्फ इन्यूमेशन का हवाला और पहचान का संकट
सीएम ने राज्यपाल द्वारा हाल ही में की गई स्व-गणना की प्रक्रिया का उदाहरण देते हुए कहा कि जब विहित प्रपत्र में अनुसूचित जाति और जनजाति के कॉलम हैं, तो आदिवासी समाज की विशिष्ट ‘सरना धर्म’ पहचान के लिए पृथक प्रावधान क्यों नहीं? उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि जनगणना में किसी समुदाय की विशिष्ट पहचान को दर्ज नहीं किया गया, तो भविष्य में उनके लिए बनने वाली नीतियों और योजनाओं पर इसका सीधा और प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.
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प्रमुख मांगें और तर्क:
• विधानसभा का संकल्प: झारखंड विधानसभा द्वारा सर्वसम्मति से पारित ‘सरना धर्म कोड’ के प्रस्ताव का सम्मान हो.
• सांस्कृतिक अस्मिता: प्रकृति पूजा, जल-जंगल-जमीन और विशिष्ट त्योहारों के आधार पर सरना धर्म को एक स्वतंत्र धर्म के रूप में मान्यता मिले.
• सामाजिक समरसता: जनगणना में पृथक कोड न केवल आदिवासियों को सम्मान देगा, बल्कि यह लोकतांत्रिक सहभागिता को भी और सुदृढ़ करेगा.
