Pakur : सरकार की ओर से सुदूर ग्रामीण इलाकों और आदिम जनजाति के विकास के लिए चलाई जा रही योजनाएं धरातल पर कितनी कारगर हैं, इसकी एक बानगी लिट्टीपाड़ा प्रखंड में देखने मिला. लिट्टीपाड़ा प्रखंड के जामजोड़ी पंचायत अंतर्गत चिनपाड़ा गांव निवासी एक आदिम जनजाति की दिव्यांग युवती आज भी सरकारी सिस्टम की बेरुखी के कारण लाठी के सहारे जीने को मजबूर है.
दिव्यांगता के बावजूद नहीं मिली कोई सरकारी मदद
चिनपाड़ा गांव निवासी रामा पहाड़िया की पुत्री कामली पहाड़ीन शारीरिक रूप से दिव्यांग (विकलांग) है. वह ठीक से चल फिर नहीं सकती और आने जाने के लिए पूरी तरह से एक लकड़ी की लाठी पर निर्भर है. विडंबना यह है कि आज तक उसे प्रशासन या सरकार की तरफ से किसी भी प्रकार की सहायता नहीं मिली है. न तो उसे दिव्यांग पेंशन का लाभ मिल रहा है और न ही ट्राईसाइकिल जैसी कोई बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराई गई है.

लाठी के सहारे कट रही जिंदगी
परिजनों का कहना है कि घर की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय है. पिता रामा पहाड़िया खुद असमर्थ हैं. ऐसे में बेटी के इलाज या उसके लिए आवश्यक उपकरण खरीदने में परिवार पूरी तरह लाचार है. कामली को जब भी कहीं आना-जाना होता है, तो वह लाठी टेककर बेहद कठिनाई के साथ चलती है. इस आधुनिक दौर में भी एक दिव्यांग युवती का इस तरह लाचार होना स्थानीय प्रशासन के दावों पर बड़े सवाल खड़े करता है.
क्या कहते हैं ग्रामीण
ग्रामीणों का कहना है कि सुदूर क्षेत्र होने के कारण अधिकारी और जनप्रनिधि इस ओर ध्यान नहीं देते हैं. यदि सरकार की योजनाएं सही तरीके से धरातल पर उतरें, तो कामली जैसे जरूरतमंदों को लाठी का सहारा नहीं लेना पड़ेगा. ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से कामली पहाड़ीन को अविलंब सरकारी सहायता और दिव्यांग पेंशन मुहैया कराने की मांग की है.
