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 हजारीबाग के बाजारों में छाया फुटका, खुखड़ी और टेकनस, हजारों रुपये किलो तक पहुंची कीमत

Hazaribagh: हजारीबाग में मानसून की पहली बारिश के साथ ही जंगलों का अनमोल खजाना बाजारों में पहुंचने लगा है. साल (सखुआ) के...

Khukhdi
'Futka', 'Khukhdi', and 'Teknas' flood Hazaribagh markets

Hazaribagh: हजारीबाग में मानसून की पहली बारिश के साथ ही जंगलों का अनमोल खजाना बाजारों में पहुंचने लगा है. साल (सखुआ) के जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगने वाले जंगली मशरूम-फुटका (रुगड़ा/पुटू), खुखड़ी और टेकनस-इन दिनों स्थानीय हाट-बाजारों की सबसे अधिक मांग वाली वनोपज बन गए हैं.  सीमित समय के लिए उपलब्ध होने के कारण इनकी कीमत कई जगह 700 रुपये से लेकर 2,000 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है.

आदिवासी और ग्रामीण समाज के लिए ये जंगली मशरूम केवल भोजन नहीं, बल्कि पारंपरिक संस्कृति और प्रकृति से जुड़ी विरासत हैं. बरसात शुरू होते ही ग्रामीण सुबह-सुबह जंगलों में जाकर इन्हें खोजते हैं और स्थानीय बाजारों में बेचते हैं। इससे उन्हें बिना किसी बड़ी लागत के मौसमी रोजगार और अच्छी आय मिलती है.

क्यों खास हैं फुटका, खुखड़ी और टेकनस?

फुटका (रुगड़ा/पुटू): साल के पेड़ों के नीचे जमीन के भीतर उगता है. इसका स्वाद और बनावट मटन जैसी मानी जाती है, इसलिए इसे “वेजिटेरियन मटन” भी कहा जाता है.

खुखड़ी: नमी वाले जंगलों में मिलने वाला छतरीनुमा मशरूम है, जिसकी खुशबू और स्वाद इसे बेहद लोकप्रिय बनाते हैं.

टेकनस: बरसात की पहली बारिश के बाद दीमक के टीलों पर उगता है. यह दुर्लभ होने के कारण सबसे महंगे जंगली मशरूमों में गिना जाता है.

स्वाद के साथ पोषण का खजाना

विशेषज्ञों के अनुसार इन जंगली मशरूमों में प्रोटीन, फाइबर, आयरन और कई आवश्यक विटामिन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. इनमें वसा और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम होती है, इसलिए इन्हें पौष्टिक भोजन माना जाता है. सरसों के तेल और पारंपरिक मसालों के साथ बनने वाली इनकी सब्जी की खुशबू दूर-दूर तक फैल जाती है.

स्थानीय बाजारों में बढ़ी रौनक

शहर और ग्रामीण हाट-बाजारों में इन दिनों सुबह से ही खरीदारों की भीड़ उमड़ रही है. कई लोग मांसाहार से परहेज करते हैं, ऐसे में रुगड़ा और खुखड़ी की मांग और बढ़ जाती है. इन जंगली मशरूमों की व्यावसायिक खेती नहीं होती. जंगलों से संग्रह कर इन्हें बाजार तक पहुंचाने का काम मुख्य रूप से आदिवासी और ग्रामीण परिवार करते हैं. यही वजह है कि मानसून का यह छोटा-सा सीजन उनके लिए अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण स्रोत बन जाता है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि जंगलों में कई प्रकार के मशरूम उगते हैं, जिनमें कुछ जहरीले भी हो सकते हैं. हाल के दिनों में हजारीबाग सहित कई क्षेत्रों में अज्ञात जंगली मशरूम खाने से लोगों के बीमार होने की घटनाएं सामने आई हैं. इसलिए केवल अनुभवी लोगों द्वारा पहचाने गए या विश्वसनीय विक्रेताओं से खरीदे गए मशरूम का ही सेवन करना चाहिए.

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