NewsWave Desk: पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने कई आर्थिक और भू-राजनीतिक चुनौतियों का सामना किया है. अंतरराष्ट्रीय तनाव, ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और वैश्विक व्यापार पर पड़ने वाले प्रभावों ने देशों को अपने विदेशी मुद्रा भंडार की रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया है. इसी बीच वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) की एक नई रिपोर्ट ने संकेत दिया है कि आने वाले वर्षों में दुनिया के कई केंद्रीय बैंक अपने सोने के भंडार में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं.
84% केंद्रीय बैंक बढ़ाना चाहते हैं गोल्ड रिजर्व
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल द्वारा जारी सेंट्रल बैंक गोल्ड रिजर्व सर्वे के अनुसार, सर्वे में शामिल 84 प्रतिशत केंद्रीय बैंकों का मानना है कि अगले पांच वर्षों के दौरान सोना उनके विदेशी मुद्रा भंडार का और महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के दर्जनों देशों के केंद्रीय बैंक अपनी रिजर्व रणनीति में सोने की हिस्सेदारी बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में सोना अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश माना जाता है, इसलिए केंद्रीय बैंक इसके प्रति अधिक भरोसा दिखा रहे हैं.
डॉलर की हिस्सेदारी में आ सकती है कमी
सर्वे में शामिल 74 प्रतिशत केंद्रीय बैंकों ने अनुमान जताया कि अगले पांच वर्षों में वैश्विक रिजर्व में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी घट सकती है. वहीं 15 प्रतिशत बैंकों का मानना है कि इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा, जबकि केवल 11 प्रतिशत ने डॉलर की हिस्सेदारी बढ़ने की संभावना जताई.
यह रुझान इस बात का संकेत माना जा रहा है कि कई देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार को अधिक विविध और संतुलित बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं.
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RBI के पास कितना है गोल्ड रिजर्व?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, उसके पास वर्तमान में 880.52 मीट्रिक टन सोना सुरक्षित रखा गया है. जून 2026 में RBI ने स्पष्ट किया था कि उसके गोल्ड रिजर्व में कोई कमी नहीं आई है और भौतिक सोने का भंडार 880.52 टन पर स्थिर बना हुआ है.
भारत पहले से ही दुनिया के बड़े स्वर्ण भंडार रखने वाले देशों में शामिल है. पिछले कुछ वर्षों में RBI लगातार अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ाने की दिशा में काम करता रहा है.
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंक सोने की खरीद बढ़ाते हैं, तो इससे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में भी बदलाव देखने को मिल सकता है. भारत जैसे देशों के लिए यह रणनीति विदेशी मुद्रा जोखिम को कम करने और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में मददगार साबित हो सकती है.
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट से संकेत मिल रहा है कि आने वाले वर्षों में सोना केवल निवेश का माध्यम नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक आर्थिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण आधार भी बन सकता है.



