Hazaribagh : कुछ कहानियां इतिहास की किताबों में नहीं, बल्कि मिट्टी की दीवारों पर लिखी जाती हैं. कुछ विरासतें पत्थरों पर नहीं, बल्कि गांव की महिलाओं की उंगलियों से जीवंत होती हैं. हजारीबाग की सोहराय और कोहबर कला ऐसी ही अनमोल सांस्कृतिक धरोहर है, जिसने गांवों की कच्ची दीवारों से निकलकर देश ही नहीं, पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है. यह केवल चित्रकला नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति, आस्था और लोकजीवन का जीवंत दस्तावेज है.
धरती देती है रंग, महिलाएं रचती हैं इतिहास
सोहराय और कोहबर कला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें बाजार से खरीदे गए रंगों का इस्तेमाल नहीं होता. लाल गेरू, सफेद काओलिन, काली मैंगनीज युक्त मिट्टी और प्राकृतिक पीले रंगों से ग्रामीण महिलाएं घरों की दीवारों पर ऐसे चित्र उकेरती हैं, जिनमें प्रकृति और मानव जीवन का गहरा रिश्ता दिखाई देता है. इन चित्रों में पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, बेल-बूटे, फूल, ज्यामितीय आकृतियां, राजा-रानी और उर्वरता के प्रतीक प्रमुख रूप से उकेरे जाते हैं. यही वजह है कि यह कला केवल सजावट नहीं, बल्कि लोक संस्कृति की सशक्त अभिव्यक्ति मानी जाती है. दीपावली के बाद मनाए जाने वाले सोहराय पर्व के अवसर पर पशुधन, कृषि और समृद्धि की कामना के लिए घरों की दीवारों पर सोहराय चित्र बनाए जाते हैं. वहीं विवाह के समय कोहबर कला नवदंपती के सुख, समृद्धि और उर्वर जीवन का प्रतीक मानी जाती है. इस परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी गांव की महिलाएं बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के जीवित रखे हुए हैं. सोहराय और कोहबर कला की ऐतिहासिक महत्ता वर्ष 1991 में और बढ़ गई, जब हजारीबाग जिले के बड़कागांव प्रखंड स्थित इस्को रॉक आर्ट साइट की गुफाओं में हजारों वर्ष पुराने शैलचित्रों की खोज हुई. विशेषज्ञों ने अध्ययन के दौरान पाया कि उन प्राचीन शैलचित्रों और आज की सोहराय-कोहबर कला में आश्चर्यजनक समानता है. इस खोज ने इस धारणा को और मजबूत किया कि यह परंपरा लगभग दस हजार वर्षों से निरंतर जीवित है और ग्रामीण समाज, विशेषकर महिलाओं ने इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा है.


पद्मश्री बुल्लू इमाम ने दिलाई वैश्विक पहचान
इस लोककला को गांवों की सीमाओं से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने में बुल्लु इमाम का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. उन्होंने वर्षों तक इस कला का अध्ययन किया और देश-विदेश में प्रदर्शनियों, कार्यशालाओं तथा सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से सोहराय और कोहबर कला को विश्वभर में पहचान दिलाई. आज उनके प्रयासों का परिणाम है कि हजारीबाग की यह लोककला कला प्रेमियों, शोधकर्ताओं और सांस्कृतिक संस्थानों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बन चुकी है. हजारीबाग में इस कला के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए जिला प्रशासन ने भी उल्लेखनीय पहल की. तत्कालीन उपायुक्त मुकेश कुमार तथा तत्कालीन RPF कमांडेंट मुन्ना कुमार सिंह के संयुक्त प्रयास से सरकारी भवनों, सार्वजनिक स्थलों और कई घरों की दीवारों पर सोहराय चित्रांकन कराया गया. इस अभियान ने न केवल जिले की सांस्कृतिक पहचान को नई मजबूती दी, बल्कि ग्रामीण महिला कलाकारों को रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता का अवसर भी उपलब्ध कराया. इस पहल को हजारीबागवासियों ने व्यापक सराहना भी दी. सोहराय और कोहबर कला आज झारखंड की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है. इस विरासत को आगे बढ़ाने का कार्य अब गुस्ताव इमाम और अलका इमाम सहित कई कलाकार और संस्थाएं कर रही हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस अनमोल धरोहर से जुड़ी रहें. हजारीबाग की सोहराय और कोहबर कला इस बात का जीवंत उदाहरण है कि यदि लोक परंपराओं को संरक्षण, सम्मान और उचित मंच मिले, तो वे गांव की चौखट से निकलकर पूरी दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बना सकती हैं. मिट्टी, प्रकृति और संस्कृति से जुड़ी यह कला केवल हजारीबाग की नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का एक अमूल्य अध्याय है.

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