Hazaribagh : हजारीबाग शहर के गांधी मैदान के बाहर इन दिनों एक ऐसा खेल चलने की चर्चा है, जिसने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. जिस जगह से कभी अतिक्रमण हटाने के नाम पर छोटे ठेला और रेहड़ी व्यवसायियों को खदेड़ा गया था, आज वहीं फिर से सैकड़ों ठेले सज रहे हैं. सवाल यह है कि आखिर किसके संरक्षण में यह पूरा कारोबार फल-फूल रहा है? सूत्रों के अनुसार गांधी मैदान के बाहरी हिस्से में प्रतिदिन 100 से अधिक ठेले लगते हैं. इन ठेला व्यवसायियों की मेहनत से उनके घर-परिवार का चूल्हा जलता है, लेकिन चर्चा यह है कि उनकी कमाई पर कुछ सफेदपोशों की भी नजर है. आरोप है कि दो कथित कर्मचारी और एक स्वयंभू समाजसेवी इन ठेला संचालकों से नियमित वसूली का काम करते हैं.
200 रुपये प्रतिदिन का हिसाब, लाखों का खेल
स्थानीय सूत्र दावा करते हैं कि प्रत्येक ठेले से प्रतिदिन 200 रुपये या उससे अधिक की वसूली की जाती है. यदि इस दावे को सही माना जाए तो एक ठेला संचालक से महीने में लगभग 6000 रुपये तक वसूले जा रहे हैं. और यदि वहां 100 से अधिक ठेले लग रहे हैं, तो हर महीने लाखों रुपये का कथित कलेक्शन आखिर कहां जा रहा है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस जमीन और बाजार पर नगर निगम का अधिकार है, वहां होने वाली इस कथित उगाही का लाभ किसे मिल रहा है? क्या यह पैसा सरकारी खजाने में जमा हो रहा है या फिर किसी समानांतर व्यवस्था की तिजोरियां भर रहा है?
दुकानदार परेशान, ठेलेदार मजबूर
गांधी मैदान के आसपास नगर निगम द्वारा निर्मित कॉम्प्लेक्स में पहले से दुकानें आवंटित हैं. दुकानदारों का कहना है कि उनकी दुकानों के ठीक सामने ठेले लगने से व्यापार प्रभावित होता है. दूसरी ओर ठेला व्यवसायी दावा करते हैं कि रोजी-रोटी के लिए उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है. लेकिन असली सवाल व्यवस्था पर है. यदि यह अतिक्रमण है तो कार्रवाई क्यों नहीं? और यदि इसकी अनुमति है तो फिर वसूली किस बात की?
निगम के भीतर तक पहुंची है जड़ें?
सूत्रों का दावा है कि इस पूरे खेल में कुछ निगमकर्मियों की भूमिका भी सन्देह के घेरे में है. हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन शहर में चर्चा जोरों पर है कि बिना संरक्षण के इतने बड़े स्तर पर यह व्यवस्था चल पाना संभव नहीं. गांधी मैदान के बाहर लगने वाले ठेले अब केवल रोजगार का सवाल नहीं रह गए हैं, बल्कि यह मामला सरकारी जमीन, कथित उगाही, प्रशासनिक जवाबदेही और सिस्टम की पारदर्शिता से जुड़ गया है. यदि आरोप सही हैं तो यह सिर्फ अतिक्रमण का मामला नहीं, बल्कि गरीबों की मजबूरी पर खड़ा एक ऐसा कथित ठेला टैक्स साम्राज्य है, जो हर महीने लाखों रुपये की कमाई कर रहा है. अब निगाहें नगर निगम, जिला प्रशासन और भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों पर हैं. शहर पूछ रहा है कि आखिर गांधी मैदान के बाहर लगने वाले ठेलों का असली मालिक कौन है? और बिना पूंजी लगाए लाखों रुपये कमाने वाले वे चेहरे कौन हैं, जो अब तक पर्दे के पीछे हैं?
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