HAZARIBAGH: जिले की सरकारी शिक्षा व्यवस्था इन दिनों खुद ‘साक्षर’ होने के लिए संघर्ष कर रही है. नया शैक्षणिक सत्र (2026-27) शुरू हुए करीब एक माह बीतने को है, लेकिन जिले के 1457 स्कूलों में न तो अब तक किताबें पहुंची हैं और न ही विद्यालय विकास की राशि मिली है. आलम यह है कि स्कूलों को चलाने के लिए शिक्षक अपनी जेब से पैसे खर्च कर रहे हैं.
वेतन से खरीदी जा रही चॉक-डस्टर और पंजी
फंड के अभाव में शिक्षकों की स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण हो गई है. कई स्कूलों में शिक्षकों ने अपने वेतन से नामांकन पंजी, उपस्थिति पंजी, चॉक और डस्टर जैसे जरूरी सामान खरीदे हैं. शिक्षकों का कहना है कि सत्र की शुरुआत में कई तरह के प्रशासनिक काम होते हैं, जिनके लिए रजिस्टर अनिवार्य हैं. कुछ शिक्षकों ने तो स्कूल के संचालन के लिए अब तक अपनी जेब से 10 हजार रुपये तक खर्च कर दिए हैं.
फंड के गणित में उलझा विभाग
नियमत विद्यालय विकास कोष की राशि मार्च माह तक जारी हो जानी चाहिए थी, लेकिन विभागीय सुस्ती के कारण सत्र 2025-26 की राशि समय पर नहीं आने से ‘लैप्स’ हो गई. अब नए सत्र के 24 दिन बीत जाने के बाद भी छात्र संख्या के आधार पर मिलने वाली राशि का अता-पता नहीं है.
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किस छात्र संख्या पर कितना मिलता है फंड:
- 100 छात्रों तक: ₹25,000
- 101 से 250 छात्रों तक: ₹50,000
- 250 से ऊपर: ₹75,000 से ₹1,00,000 तक
साफ-सफाई और पेयजल व्यवस्था पर संकट
विकास कोष की राशि केवल स्टेशनरी के लिए नहीं, बल्कि स्कूल में पेयजल, शौचालय की मरम्मत और साफ-सफाई के लिए भी होती है. फंड नहीं मिलने से स्कूलों में स्वच्छता अभियान ठप पड़ा है. शिक्षक किसी तरह ‘जुगाड़’ के सहारे स्कूल की घंटी बजा रहे हैं, लेकिन संसाधनों की कमी का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और उनके स्वास्थ्य पर पड़ रहा है. विभागीय अधिकारियों के पास फिलहाल इस देरी का कोई ठोस जवाब नहीं है, जिससे जिले के हजारों बच्चों का भविष्य अधर में लटका नजर आ रहा है.
