Ranchi: कभी एशिया की मदर इंडस्ट्री कहे जाने वाली एचईसी (हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन) मरणासन्न स्थिति में पहुंच चुकी है. हालात ऐसे हैं कि यदि जल्द कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो साल के अंत तक ताला लगना तय माना जा रहा है. फिलहाल कर्मचारी और मजदूर मौजूदा कार्यादेशों को पूरा करने में जुटे हुए हैं, ताकि हालात में कुछ सुधार लाया जा सके. वहीं यूनियन भारी उद्योग मंत्रालय से लगातार गुहार लगा रही है, ताकि आर्थिक सहायता के जरिए कारखाने को बंद होने से बचाया जा सके.

जमीन बेचने की अनुमति की आस
फिलहाल कारखाने को बचाने के लिए एकमात्र रास्ता जमीन बेचने को बताया जा रहा है. एचईसी अपनी 200 एकड़ जमीन बेचकर वित्तीय स्थिति सुधारना चाहती है, लेकिन इसके लिए केंद्र सरकार की अनुमति जरूरी है. यूनियन की लगातार मांग के बाद एक पार्लियामेंट्री कमिटी का गठन किया गया है, जिसके अध्यक्ष केरल से सांसद के. कुरुची शिवा हैं. जानकारी के अनुसार बीते 7 अप्रैल को कमिटी का दौरा प्रस्तावित था, लेकिन चुनाव के कारण यह टल गया. वहीं भारी उद्योग मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी का प्रस्तावित दौरा भी फिलहाल ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है. यदि जल्द सकारात्मक पहल नहीं हुई, तो बढ़ते बकाये और कार्यादेशों की कमी के कारण कारखाने पर ताला लगना तय माना जा रहा है.
नए ऑर्डर नहीं मिले तो प्लांट ठप होने की स्थिति
बीते तीन वर्षों में एचईसी में लगातार कार्यादेश घटते जा रहे हैं. कभी 5000 करोड़ रुपये से अधिक कार्यादेश वाली एचईसी अब महज 400 करोड़ रुपये के कार्यादेश पर सिमट गई है. बीते एक वर्ष में यह आंकड़ा 1400 करोड़ से घटकर 400 करोड़ तक पहुंच गया है. इसमें 250 करोड़ रुपये प्रोजेक्ट और 150 करोड़ रुपये वर्कशॉप कार्य से जुड़े हैं. यूनियन का कहना है कि यदि जल्द नए कार्यादेश नहीं मिले, तो प्लांट पूरी तरह ठप होने की स्थिति में पहुंच जाएंगे और काम की कमी के कारण ताले की नौबत आ जाएगी.
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मौजूदा कार्यादेश के रॉ मटेरियल के लिए भी पैसे नहीं
एचईसी के पीआरओ संजय कुमार के अनुसार, वर्तमान में कंपनी के पास लगभग 400 करोड़ रुपये का कार्यादेश है, लेकिन इन्हें पूरा करने के लिए रॉ मटेरियल खरीदने तक के पैसे नहीं हैं. इसके कारण समय पर कार्य पूरा करना संभव नहीं हो पा रहा है. यह कार्यादेश पहले लगभग 1400 करोड़ रुपये का था, लेकिन रॉ मटेरियल की कमी के कारण करीब 1000 करोड़ रुपये के ऑर्डर वापस हो गए. फिलहाल बचे हुए कार्यादेश पर भी संकट बना हुआ है और जल्द ठोस कदम उठाने की जरूरत है.
बिजली का बिल पहुंचा 300 करोड़
झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड के डीके सिंह के अनुसार, एचईसी पर बिजली बिल का बकाया लगभग 300 करोड़ रुपये पहुंच चुका है. निगम की ओर से लगातार नोटिस जारी किया जा रहा है और फिलहाल कम से कम 50 करोड़ रुपये भुगतान की आवश्यकता बताई गई है. यदि निर्धारित समय तक भुगतान नहीं हुआ, तो बिजली काटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा. मौजूदा राज्य सरकार मानवीय आधार पर लगातार बिजली उपलब्ध करा रही है, लेकिन इसे लंबे समय तक जारी रखना संभव नहीं है.
वेतन, ऋण और बिजली बिल मिलाकर 2000 करोड़ पहुंचा बकाया
एक ओर कार्यादेश घट रहे हैं, तो दूसरी ओर बकाया लगातार बढ़ता जा रहा है. वर्तमान स्थिति में एचईसी पर लगभग 2000 करोड़ रुपये का बकाया है. इसमें वेतन लगभग 150 करोड़, बिजली बिल 300 करोड़, सीपीएफ 300 करोड़, ग्रेच्युटी 70 करोड़, ऋण 300 करोड़ और सीआईएसएफ सुरक्षा मद में 310 करोड़ रुपये शामिल हैं. इसके अलावा भुगतान में देरी के कारण लगातार कंपाउंड इंटरेस्ट भी बढ़ रहा है, जो स्थिति को और चिंताजनक बना रहा है.
जमीन बेचना ही एकमात्र विकल्प
कारखाने को फिलहाल लगभग 3000 करोड़ रुपये की जरूरत है. इसके लिए 200 एकड़ जमीन बेचकर 2892 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बनाई गई है. जमीन बिक्री की अनुमति के लिए पिछले तीन वर्षों से केंद्र सरकार से मांग की जा रही है, लेकिन अब तक इस पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है. यूनियन नेताओं का कहना है कि यदि समय रहते अनुमति नहीं मिली, तो जमीन बेचकर भी एचईसी को बचाना मुश्किल हो जाएगा. मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, जमीन बिक्री से मिलने वाली राशि में से लगभग 2000 करोड़ रुपये बकाया भुगतान में चले जाएंगे और करीब 892 करोड़ रुपये रॉ मटेरियल व पूंजीगत जरूरतों के लिए बचेंगे. लेकिन यदि देरी हुई, तो बकाया और बढ़ेगा और फिर कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा.
