Ravi Bharti
Ranchi: यह सिर्फ एक नागरिक सम्मान का वितरण नहीं था, बल्कि इतिहास के पन्नों पर दर्ज उस अटूट संघर्ष पर देश की संप्रभुता द्वारा लगाई गई कृतज्ञता की मुहर थी, जिसने आधी सदी तक जल, जंगल और जमीन की अस्मिता को जिंदा रखा. मंगलवार यानि 23 जून को देश की राजधानी नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में जब पद्मभूषण पुरस्कार के लिए दिशोम गुरु शिबू सोरेन का नाम पुकारा गया, तो पूरा हॉल एक निशब्द सम्मान और गौरव से भर उठा. झारखंड आंदोलन के अमर पुरोधा, आदिवासियों के मसीहा और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक दिवंगत शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के इस प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान से नवाजा गया. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों जब यह सम्मान प्रदान किया गया, तो मंच पर दिशोम गुरु की कमी को आंसुओं और गर्व के मिश्रित भावों के साथ उनकी जीवनसंगिनी रूपी सोरेन ने पूरा किया. अपने हमसफर के त्याग और करोड़ों आदिवासियों के संघर्ष की प्रतीक बनकर पहुंचीं रूपी सोरेन ने जब यह पुरस्कार ग्रहण किया, तो ऐसा लगा मानो रामगढ़ के नेमरा गांव की पगडंडियों से शुरू हुआ एक ऐतिहासिक सफर आज देश के सबसे सर्वोच्च शिखर पर विश्राम पा रहा था. केंद्र सरकार ने इसी वर्ष 25 जनवरी को लोक कल्याण के क्षेत्र में उनके अविस्मरणीय योगदान के लिए इस सम्मान की घोषणा की थी, जो आज एक भावुक क्षण के रूप में साकार हुआ.साथ में दिशोम गुरू शिबू सोरेन की बहु कल्पना सोरेन भी इस ऐतिहासिक पल की गवाह बनी.

पिता की शहादत से उपजा प्रतिशोध, जो आदिवासियों का रक्षाकवच बन गया
दिशोम गुरु का पूरा जीवन किसी महाकाव्य की तरह है, जिसमें दुःख, संघर्ष, त्याग और अंत में विजय की गाथा लिखी है. 11 जनवरी 1944 को रामगढ़ के छोटे से गांव नेमरा में सोबरन सोरेन के घर जन्मे शिबू सोरेन की प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय स्तर पर ही हुई थी. सब कुछ सामान्य चल रहा था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. महज 13 वर्ष की अल्पायु में, जब बच्चे जीवन के सपने बुनते हैं, शिबू सोरेन के सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया. सूदखोरों और महाजनों के जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उनके पिता की निर्मम हत्या कर दी गई थी. पिता के शव के सामने खड़े उस 13 साल के बालक की आंखों में सिर्फ आंसू नहीं थे, बल्कि शोषकों के साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का एक संकल्प था.इस वीभत्स घटना ने उनके जीवन की दिशा को पूरी तरह बदल दिया. उन्होंने महाजनी प्रथा, शोषण और आदिवासियों की जमीनों पर जबरन कब्जे के खिलाफ एक ऐसा आंदोलन छेड़ दिया जिसने पूरे झारखंड की चूलें हिला दीं. उन्होंने गांव-गांव जाकर आदिवासियों और वंचितों को जगाया. उनका यह जन-आंदोलन इतना प्रभावी था कि महाजन बैकफुट पर आ गए और वे गरीबों को उनकी छीनी हुई जमीनें वापस दिलाने में सफल रहे. इसी दौर ने एक साधारण से युवा को जनता का चहेता गुरुजी बना दिया.
जब गुरुजी बने दिशोम गुरु: संथाल की माटी से उठी अस्मिता की हुंकार
शिबू सोरेन के व्यक्तित्व का असली विस्तार तब हुआ जब उनका आंदोलन संथाल परगना के जंगलों और पहाड़ों में पहुंचा. इस इलाके ने उन्हें सिर्फ नेता नहीं माना, बल्कि अपना भगवान, अपना संरक्षक मान लिया. यहीं से उनका नाम पड़ा दिशोम गुरु यानी देश के गुरु.1970 के दशक में जब आदिवासियों की आवाज को दबाया जा रहा था, तब शिबू सोरेन ने ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ (झामुमो) की स्थापना की. यह सिर्फ एक राजनीतिक दल का गठन नहीं था, बल्कि शोषितों, पिछड़ों और वनवासियों को एक झंडे के नीचे लाकर अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ने का एक शंखनाद था. उन्होंने अलग झारखंड राज्य की मांग को एक ऐसा संगठित और आक्रामक स्वर दिया, जिसने तत्कालीन सत्ताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया. शिबू सोरेन वह नाम बन चुके थे, जिनके एक आह्वान पर हजारों तीर-धनुष जंगलों से निकलकर सड़कों पर आ जाते थे.
सड़क से संसद तक का सफर: साल 2000 का वो ऐतिहासिक स्वप्न
आज हम जिस स्वतंत्र और समृद्ध झारखंड को देख रहे हैं, उसकी नींव में दिशोम गुरु के पैरों के छाले और उनके समर्थकों का खून-पसीना शामिल है. साल 2000 में जब बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य का गठन हुआ, तो इसके पीछे झामुमो और शिबू सोरेन की आंदोलनकारी भूमिका ही सबसे निर्णायक कारक थी. गुरुजी ने इस आंदोलन को केवल जंगलों तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने इसे ‘सड़क से संसद’ तक पहुंचाया. दिल्ली के सत्ता गलियारों में जब तक झारखंड की गूंज नहीं सुनाई दी, वह शांत नहीं बैठे. राज्य बनने के बाद भी उनका मिशन रुका नहीं. मुख्यमंत्री, सांसद या केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने हमेशा अपनी राजनीति के केंद्र में सूबे के गरीब, किसान, श्रमिक और वनों में रहने वाले अंतिम व्यक्ति को ही रखा.
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तीन बार संभाली राज्य की कमान
शिबू सोरेन का राजनीतिक सफर चार दशकों से भी अधिक लंबा और बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा. वह एक ऐसे विरले राजनेता थे जिन्होंने संगठनकर्ता, समाज सुधारक, विधायक, सांसद और मुख्यमंत्री जैसी हर भूमिका में अमिट छाप छोड़ी. वह तीन बार (2005, 2008 और 2009-10) झारखंड के मुख्यमंत्री बने. हालांकि, गठबंधन की जटिल राजनीति के कारण उनके कार्यकाल लंबे नहीं चल सके, लेकिन जितने भी दिन वह सत्ता के शीर्ष पर रहे, नीतियां हमेशा गरीबों के हक में बनीं.
संसदीय राजनीति में तो उनका कोई सानी ही नहीं
संसदीय राजनीति में तो उनका कोई सानी ही नहीं था. वह दुमका लोकसभा सीट से 8 बार सांसद चुने गए, जो उनकी अगाध लोकप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण है. इसके अलावा वह राज्यसभा के सदस्य भी रहे और केंद्र सरकार में तीन अलग-अलग कार्यकालों में कोयला मंत्री जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को बखूबी संभाला. ग्राम पंचायत की चौपाल से लेकर देश की सबसे बड़ी पंचायत (संसद) तक, उनकी दहाड़ हमेशा आदिवासियों और वंचितों की ढाल बनी रही.
एक युग का अंत, पर अमर रहेगी दिशोम गुरु की वैचारिक लौ
वर्ष 2025 में 81 वर्ष की आयु में जब इस महायोद्धा ने अपनी अंतिम सांसें लीं, तो मानो झारखंड के पहाड़ों ने अपना रक्षक और जंगलों ने अपनी आत्मा को खो दिया था. लेकिन दिशोम गुरु जैसे जननेता कभी मरते नहीं हैं, वे विचारों के रूप में, लोकगीतों के रूप में और हक की लड़ाइयों में हमेशा जिंदा रहते हैं. आज जब राष्ट्रपति भवन में उन्हें ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया जा रहा था, तो ऐसा लग रहा था कि यह देश के लोकतंत्र द्वारा एक ऐसे निर्भीक, बेबाक और स्वाभिमानी आदिवासी नेता को सलाम है, जिसने कभी भी राजनीतिक नफे-नुकसान के लिए अपने समुदाय के हितों से समझौता नहीं किया. भले ही आज दिशोम गुरु हमारे बीच भौतिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन यह सम्मान इस बात की गवाही है कि जब-जब जल, जंगल और जमीन की रक्षा की बात होगी, इतिहास में शिबू सोरेन का नाम स्वर्णिम अक्षरों में सबसे ऊपर चमकेगा. उनकी यह अमर विरासत अब पद्मभूषण की चमक के साथ आने वाली पीढ़ियों को हक के लिए लड़ना सिखाती रहेगी.


