Ranchi : एक तरफ सरकार जहां प्रशासनिक सुधारों और सेवाओं के एकीकरण की बात करती है, वहीं झारखंड की नौकरशाही में पदानुक्रम का घालमेल एक बड़ा सवाल बनकर उभरा है. देश के विभिन्न राज्यों में जहां भारतीय राजस्व सेवा IRS और इंडियन सिविल एकाउंट्स सर्विस ICAS के अधिकारियों को सचिव और प्रधान सचिव जैसे महत्वपूर्ण नीतिगत पदों पर जिम्मेदारी दी जा रही है. वहीं झारखंड में इन सेवाओं के प्रति राज्य सरकार का दृष्टिकोण अब भी संकीर्ण बना हुआ है.
दूसरे राज्यों में मिल रही कमान, झारखंड में दरकिनार
अन्य राज्यों को देखें तो वहां प्रतिभा को सेवा संवर्ग के दायरे से ऊपर उठकर सराहा जा रहा है. जम्मू-कश्मीर में आइआरएस अधिकारी आलोक कुमार को उच्च शिक्षा विभाग में प्रधान सचिव रैंक की जिम्मेदारी दी गई, जो इस बात का प्रमाण है कि प्रशासनिक दक्षता किसी विशेष सेवा संवर्ग की मोहताज नहीं है. इसी तरह, मिजोरम में आइसीएएस अधिकारी वानीलालदीना फनाई को मुख्यमंत्री का सचिव और कमिश्नर जैसे अत्यंत संवेदनशील पदों पर नियुक्त किया गया है.

झारखंड का विरोधाभास
झारखंड के संदर्भ में स्थिति काफी निराशाजनक है. राज्य के इतिहास में अब तक केवल इक्का-दुक्का उदाहरण ही मिलते हैं. जिनमें आइआरएस अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति का मौका मिला है. इसमें निशा उरांव का ग्रामीण विकास विभाग में निदेशक के पद पर कार्य करना एक अपवाद की तरह है. आइआरएस और आइसीएएस जैसे संवर्ग, जो वित्तीय प्रबंधन और राजस्व प्रणाली के विशेषज्ञ माने जाते हैं. उन्हें राज्य के नीति-निर्धारण से दूर रखना झारखंड के लिए एक अवसर गंवाने जैसा है.
क्या है समय की मांग
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि झारखंड को सुशासन के नए आयाम छूने हैं, तो उसे अपनी संकीर्ण मानसिकता से बाहर आना होगा. जब दूसरे राज्य आइआरएस और आइसीएएस के अनुभवी हाथों में राज्य की कमान सौंपकर बेहतर परिणाम हासिल कर रहे हैं, तो झारखंड क्यों पीछे है? राज्य सरकार को अब ‘सेवा कैडर’ के आग्रह को छोड़कर ‘योग्यता आधारित प्रशासन’ की ओर कदम बढ़ाना चाहिए.
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