Dheeraj Singh
Ranchi : झारखंड पुलिस मेंस एसोसिएशन के अध्यक्ष कर्ण सिंह की कार्यशैली से सिपाही और हवलदार में नाराजगी है. इस संगठन में करीब साठ हजार की संख्या में सिपाही और हालदार सदस्य है. नाराजगी की प्रमुख वजह सिपाही और हवलदारों की मांगों को नहीं उठाना है. साथ ही उनके लिये कोई खास व्यवस्था नहीं करना है. ऐसे में अध्यक्ष के लिये सिपाही और हवलदारों की ये मांग चुनौती बनती जा रही है. सिपाही और हवलदारों का कहना है कि कर्ण सिंह को अध्यक्ष सभी ने मिलकर चुना, लेकिन अध्यक्ष बनते ही सभी वादों से मुकर गये. झारखंड पुलिस मेंस एसोसिएशन का अध्यक्ष बनते ही कर्ण सिंह अपने हितों में लग गये, लेकिन सिपाही और हवलदारों की जरूरतों की कोई फिक्र नहीं है. यदि परिस्थितियों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ तो एक सुर में उनके खिलाफ आवाज बुलंद होने वाली है.

नेतृत्व परिवर्तन की उठने लगी मांग
झारखंड पुलिस मेंस एसोसिएशन के भीतर सुलग रहा असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है. एसोसिएशन के अध्यक्ष की कार्यशैली से नाराज सिपाही और हवलदार रैंक के जवानों ने मोर्चा खोल दिया है. करीब 60 हजार सदस्यों वाले इस विशाल संगठन में आंतरिक कलह इस कदर बढ़ गया है कि अब नेतृत्व परिवर्तन तक की मांग उठने लगी है. जवानों का आरोप है कि एसोसिएशन का वर्तमान नेतृत्व उनकी समस्याओं को उठाने और उनके हितों की रक्षा करने में पूरी तरह विफल साबित हो रहा है.
हजारीबाग ट्रेजरी घोटाले पर चुप्पी बनी मुख्य वजह
विवाद के ताजा काराणों में एक हजारीबाग में सामने आया बहुचर्चित ट्रेजरी घोटाला है. इस घोटाले में पुलिस विभाग के कई जवानों और कर्मियों की गाढ़ी कमाई और वित्तीय सुरक्षा दांव पर लगी है. नाराज सिपाही कर्मियों का कहना है कि इतने बड़े वित्तीय घपले के बाद भी एसोसिएशन के अध्यक्ष ने चुप्पी साध रखी है. जवानों का आरोप है कि जहां अध्यक्ष को आगे आकर पीड़ित जवानों का पक्ष लेना चाहिए था और निष्पक्ष जांच की मांग करनी चाहिए थी. वहीं उनकी निष्क्रियता ने संगठन के प्रति अविश्वास पैदा कर दिया है. जवानों के बीच यह चर्चा आम है कि नेतृत्व किसी दबाव में काम कर रहा है या जानबूझकर इस संवेदनशील मामले को ठंडे बस्ते में डालना चाहता है.
साठ हजार सदस्यों के प्रतिनिधित्व पर उठे सवाल
गौरतलब है कि झारखंड पुलिस मेंस एसोसिएशन राज्य के सबसे बड़े और प्रभावशाली संगठनों में से एक है. इसमें पूरे राज्य से लगभग साठ हजार सिपाही और हवलदार शामिल हैं. कानून व्यवस्था बनाएं रखने में दिन-रात मुस्तैद रहने वाले इन जवानों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद उनकी आवाज को दबाया जा रहा है. आंदोलित कर्मियों का कहना है कि एसोसिएशन का गठन जवानों के कल्याण और उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए किया गया था, न कि व्यक्तिगत हितों को साधने या अधिकारियों के सामने मूकदर्शक बने रहने के लिए.
नेतृत्व की साख दांव पर
इस पूरे घटनाक्रम ने मेंस एसोसिएशन के वर्तमान पदाधिकारियों की साख को पूरी तरह से दांव पर लगा दिया है. आम सिपाहियों का बढ़ता आक्रोश इस बात का संकेत है कि संगठन के भीतर अब बड़े बदलाव की तैयारी हो रही है. इन सभी पुलिसकर्मी और हवलदारों की नाराजगी का असर उनके ड्यूटी पर पड़ता है यदि झारखंड पुलिस मेंस एसोसिएशन के अध्यक्ष उनकी बातों और जरूरत को नजर अंदाज करती है तो भविष्य में किसी और नेतृत्वकर्ता को चुना जा सकता है.
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