Ranchi: झारखंड की सियासी पिच पर राज्यसभा चुनाव का मुकाबला इस बार उम्मीद से कहीं ज्यादा नाटकीय और चौंकाने वाला रहा. सत्ता के गलियारों में चल रही शह और मात के खेल के बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा के बैजनाथ राम और एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी ने शानदार बाजी मार ली है. वहीं, बड़े-बड़े रणनीतिकारों को मैदान में उतारने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है. इस चुनाव ने न सिर्फ झारखंड की दो राज्यसभा सीटों का फैसला किया, बल्कि सूबे की राजनीति में क्रॉस वोटिंग के जिन्न को एक बार फिर जगा दिया है. चुनावी नतीजों ने हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन की एकजुटता की कलई खोलकर रख दी है, जिससे आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले सत्ताधारी खेमे में बेचैनी बढ़ना तय है.
नतीजों का गणित
- जेएमएम उम्मीदवार: 31 वोट
- परिमल नाथवाणी: 28 वोट (जीत दर्ज की)
- प्रणव झा- 19
- कुल तीन वोट इनवैलिड हुए
परिमल नाथवानी: चौथी बार संसद पहुंचने का रिकॉर्ड
झारखंड की राजनीति में परिमल नाथवानी एक ऐसा नाम बन चुके हैं, जिन्हें सियासी समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ने का महारथी माना जाता है. इस जीत के साथ ही नाथवानी ने रिकॉर्ड चौथी बार राज्यसभा पहुंचने का गौरव हासिल किया है. हालांकि, वह लगातार चौथी बार एक ही राज्य से जीतकर एक अद्वितीय इतिहास रचने से मामूली रूप से चूक गए, क्योंकि उनका पिछला कार्यकाल आंध्र प्रदेश से था. इसके बावजूद, झारखंड की धरती पर उनका जादू एक बार फिर सिर चढ़कर बोला.
नाथवानी का झारखंड से नाता बेहद पुराना और दिलचस्प
• 2008 का आगाज: परिमल नाथवानी के सियासी सफर की शुरुआत साल 2008 में झारखंड की इसी लाल माटी से हुई थी। तब उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा था और राजद समेत कई अन्य दलों के अप्रत्याशित समर्थन से पहली बार संसद पहुंचे थे.
• 2014 का निर्विरोध सफर: इसके बाद साल 2014 में उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता इतनी बढ़ी कि वे बीजेपी और आजसू के समर्थन से निर्विरोध राज्यसभा के लिए चुन लिए गए.
• 2020 का आंध्र प्रदेश का मोड़: साल 2020 में उन्होंने अपनी सियासी पिच बदली और आंध्र प्रदेश से वाईएसआर कांग्रेस के टिकट पर संसद पहुंचे.
• 2026 में फिर झारखंड वापसी’: अब 2026 में, नाथवानी एक बार फिर झारखंड के मैदान में उतरे। इस बार उन्हें बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए का पूरा और अटूट समर्थन मिला, जिसने उनकी जीत की राह को बेहद आसान बना दिया.
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हेमंत सोरेन का मास्टरस्ट्रोक: बैजनाथ राम के जरिए दलितों की लामबंदी
एक तरफ जहां परिमल नाथवानी की जीत के पीछे कॉर्पोरेट और राजनीतिक मैनेजमेंट की ताकत थी, वहीं दूसरी तरफ जेएमएम उम्मीदवार बैजनाथ राम की जीत विशुद्ध रूप से एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक संदेश है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बैजनाथ राम को राज्यसभा भेजकर एक तीर से कई निशाने साधे हैं. लातेहार क्षेत्र सहित पूरे झारखंड के अनुसूचित जाति समाज में बैजनाथ राम की पैठ बेहद गहरी और मजबूत मानी जाती है। राज्य में कुछ ही महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में ऐन वक्त पर एक प्रमुख दलित चेहरे को देश के उच्च सदन में भेजकर हेमंत सोरेन ने राज्य के दलित और वंचित समाज को यह साफ संदेश दे दिया है कि उनके हितों की असली रक्षक जेएमएम ही है. बैजनाथ राम की यह जीत जेएमएम के पारंपरिक ‘आदिवासी-मूलवासी’ वोट बैंक के साथ-साथ दलित मतदाताओं को जोड़ने की रणनीति में एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हो सकती है.
क्रॉस वोटिंग का खेल: तार-तार हुई गठबंधन की एकजुटता
इस चुनाव का सबसे स्याह पहलू कांग्रेस के लिए रहा। कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की हार सिर्फ एक व्यक्ति की हार नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस के आंतरिक असंतोष और गठबंधन के भीतर गहरे अविश्वास की कहानी बयां करती है. मतदान के दौरान हुई ‘क्रॉस वोटिंग’ ने साफ कर दिया कि गठबंधन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है. दावे किए जा रहे थे कि इंडिया गठबंधन के पास अपने दोनों उम्मीदवारों को जिताने के लिए पर्याप्त संख्या बल है, लेकिन जब बैलेट बॉक्स खुला तो सारे दावे हवा हो गए। यह क्रॉस वोटिंग इसलिए भी ज्यादा शर्मनाक है क्योंकि कांग्रेस आलाकमान इस चुनाव को लेकर बेहद गंभीर था.
दिग्गज सिपहसालार भी रहे नाकाम: प्रभारी के. राजू और बेला प्रसाद का फ्लॉप शो
कांग्रेस पार्टी इस चुनाव को कितनी प्रतिष्ठा की लड़ाई मान रही थी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खुद कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी के. राजू और सह-प्रभारी श्री बेला प्रसाद को पोलिंग एजेंट बनाया गया था. पार्टी के इन दो सबसे बड़े दिग्गजों की सीधी निगरानी में मतदान हो रहा था। हर एक विधायक पर पैनी नजर रखने के निर्देश थे. आलाकमान के ये सिपहसालार अपनी ही पार्टी के विधायकों को एकजुट रखने और क्रॉस वोटिंग रोकने में पूरी तरह नाकाम रहे.
आगामी विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा गहरा असर
इस राज्यसभा चुनाव के परिणाम झारखंड की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने वाले हैं। इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिलेंगे. कांग्रेस अब सहयोगियों को शक की निगाह से देखेगी, वहीं जेएमएम भी कांग्रेस के भीतर मचे आंतरिक कलह से दूरी बनाने की कोशिश करेगी. सीट शेयरिंग के वक्त जेएमएम अब ज्यादा आक्रामक रुख अख्तियार कर सकती है. निर्दलीय परिमल नाथवानी को जिताकर एनडीए ने यह साबित कर दिया है कि वह सत्ता पक्ष के असंतुष्टों को भुनाने में माहिर है। इससे आगामी विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी कार्यकर्ताओं का जोश सातवें आसमान पर पहुंच गया है.
दलित राजनीति का नया ध्रुवीकरण
बैजनाथ राम की जीत के बाद जेएमएम अब खुद को दलितों के मसीहा के रूप में पेश करेगी, जिससे बीजेपी के पारंपरिक दलित वोट बैंक में सेंध लगने का खतरा बढ़ गया है. इस सियासी जंग ने यह साबित कर दिया है कि राजनीति में जो दिखता है, वो होता नहीं। परिमल नाथवानी की ‘घर वापसी’ और बैजनाथ राम का ‘उदय’ जहां एनडीए और जेएमएम के लिए जश्न का मौका लेकर आया है, वहीं कांग्रेस के लिए यह आत्ममंथन की एक ऐसी गंभीर घड़ी है, जिसे अगर अनदेखा किया गया तो आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए संभलना मुश्किल हो जाएगा.



