गठबंधन से JMM के बैजनाथ राम, कांग्रेस के प्रणव झा और निर्दलीय परिमल नाथवानी ने भरा परचा, सभी ने किया जीत का दावा, नाथवानी ने कहा – झारखंड मेरी कर्मभूमि

Ranchi : झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए शह और मात का खेल अब उस मुकाम पर पहुंच गया है. जहां...

Ranchi : झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए शह और मात का खेल अब उस मुकाम पर पहुंच गया है. जहां लोकतंत्र के मंदिर के बाहर नंबर गेम का बाजार गर्म है. सोमवार को गठबंधन से जेएमएम के बैजनाथ राम, कांग्रेस के प्रणव झा और बीजेपी समर्थित निर्दलीय परिमल नाथवानी ने परचा दाखिल कर दिया. परचा दाखिल करने के बाद सभी ने जीत अपनी अपनी जीत का दावा किया. जेएमएम के उम्मीदवार बैजनाथ राम और कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा ने दो – दो सेट में नामांकन किया. सीएम हेमंत सोरेन बैजनाथ राम के प्रस्तावक बनें. प्रणव झा के प्रस्तावक राजद विधायक बनें. प्रणव झा ने कहा कि बीजेपी धन बल के जरीए चुनाव को प्रभावित करना चाह रही है जो यहां संभव नहीं है. आंकड़ा हमारे पक्ष में है. बैजनाथ राम ने जीत का दावा करते हुए कहा कि हम दोनों सीच जीतेंगे.

झारखंड मेरी कर्मभूमि है : नाथवानी

नामांकन दाखिल करने के बाद परिमल नाथवानी ने कहा कि झारखंड में काम कर चुका हूं. इस बार मौका मिलेगा तो और ज्यादा काम करूंगा. मेरे संबंध सभी से हैं. मैं कभी बाहरी नहीं था. झारखंड मेरी कर्मभूमि है. मैं सबके साथ मिलकर काम करने वाला हूं. मैं सीएम हेमंत सोरेन से मिला था. कांग्रेस से मिला था. निर्दलीय से भी मिला था. मैं सभी को जानता हूं. पहले भी पार्टी लेवल से नहीं आया था. दूसरे लोगों ने मुझे समर्थन दिया था. मैं जीत के प्रति 100 परसेंट कांफिडेंट हूं. नाथवानी के नामांकन के वक्त बीजेपी के सभी विधायक मौजूद रहे.

झामुमो का दलित कार्ड बनाम भाजपा का बाहरी दांव

जैसे ही नाथवानी ने पर्चा भरा, जेएमएम के कद्दावर प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने अपनी चिरपरिचित आक्रामक शैली में भाजपा की घेराबंदी शुरू कर दी. सुप्रियो ने बिना वक्त गंवाए एक ऐसा तीर छोड़ा है, जिसका जवाब फिलहाल भाजपा के पास नहीं है. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि नॉमिनेशन का फॉर्म भरना और बैलेट पेपर पर वोट पाना, दो अलग-अलग दुनिया की बातें हैं. फॉर्म तो कोई भी खरीद सकता है, लेकिन वफादारी नहीं. भाजपा ने इतिहास में कभी किसी दलित को झारखंड से राज्यसभा नहीं भेजा. जेएमएम उम्मीदवार बैजनाथ राम स्थानीय भी हैं और दलित भी. यह पहली बार होगा जब कोई मूल निवासी दलित इस राज्य का प्रतिनिधित्व करने दिल्ली जाएगा. बीजेपी अपना नैतिक आधार खो चुकी है. बड़े पैमाने पर पैसों का खेल होगा. बैजनाथ राम को आगे कर गठबंधन ने सोशल इंजीनियरिंग का ऐसा ताना-बाना बुना है. जिसे भेदना एनडीए के लिए टेढ़ी खीर साबित होने वाला है.

नाथवानी को 4 वोटों का अकाल

नाथवानी की एंट्री ने इस सीधे-साधे चुनाव को थ्रिलर फिल्म बना दिया है. नाथवानी की जेब में एनडीए के 24 विधायकों का समर्थन तो है, लेकिन दिल्ली का टिकट पक्का करने के लिए अभी भी 4 वोटों का अकाल है. अब देखना यह है कि ये चार बाहरी खेवनहार कौन होते हैं जो नाथवानी की नैया पार लगाते हैं, या फिर वे इन्हें बीच भंवर में ही छोड़ देते हैं. यह 4 वोटों की कमी ही इस पूरे चुनाव का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट और क्रॉस वोटिंग की आशंकाओं का नया केंद्र बन चुकी है.

आखिर कौन बदलेगा पाला ?

फिलहाल रांची के राजनीतिक गलियारों में दावों की ऐसी बौछार हो रही है मानो हर दल के पास जादुई आंकड़े हों. गठबंधन के दोनों उम्मीदवारों के पास जीत के लिए पर्याप्त और सुरक्षित संख्या बल है. उनके चेहरे की मुस्कान बता रही है कि वे निश्चिंत हैं. लेकिन असली हलचल उस खेमे में है जहां चार वोटों की तलाश जारी है. राजनीति के जानकारों का मानना कि यह चुनाव केवल दो सीटों को भरने का जरिया नहीं है, बल्कि यह झारखंड विधानसभा के भीतर चलने वाली अंडरकरंट राजनीति का लिटमस टेस्ट है. अगर परिमल नाथवानी वो चार वोट जुटाने में कामयाब रहे, तो यह विपक्षी खेमे में बड़ी सेंधमारी मानी जाएगी. और अगर वे फेल रहे, तो यह भाजपा समर्थित रणनीति की करारी हार होगी.

वोटों की मंडी या लोकतंत्र का मेला

अब जब तीर कमान से निकल चुका है और परचे दाखिल हो चुके हैं, तो अगले कुछ दिन झारखंड की राजनीति के लिए रैंसम पीरियड जैसे होंगे. रिजॉर्ट पॉलिटिक्स, मान-मनौव्वल और अंडर द टेबल डीलिंग्स की सुगबुगाहट तेज हो चुकी है. देखना दिलचस्प होगा कि झारखंड की माटी से उपजा दलित और स्थानीय का नैरेटिव जीतता है, या फिर एनडीए समर्थित कॉरपोरेट मैनेजमेंट की चाणक्य नीति भारी पड़ती है.

 

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