Ranchi: झारखंड की राजधानी रांची के खेल इतिहास में आज एक सुनहरा अध्याय जुड़ गया. 135वें इंडियन ऑयल डूरंड कप के रांची चरण का भव्य उद्घाटन आज ( 26 जुलाई) मोरहाबादी स्थित बिरसा मुंडा फुटबॉल स्टेडियम में आयोजित एक रंगारंग समारोह के साथ हुआ. यह पहला अवसर है जब प्रतिष्ठित डूरंड कप की मेजबानी रांची शहर कर रहा है. इस ऐतिहासिक और भव्य समारोह का औपचारिक उद्घाटन राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा किया गया. इस आयोजन से न केवल राज्य के खेल प्रेमियों में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है, बल्कि झारखंड में फुटबॉल की समृद्ध परंपरा को भी एक नया मंच और अंतरराष्ट्रीय स्तर की पहचान मिली है.

जानिए डूरंड कप का इतिहास: क्यों पड़ा यह नाम और कौन थे डूरंड?
डूरंड कप का नाम इसके संस्थापक सर हेनरी मॉर्टिमर डूरंड के नाम पर रखा गया है, जो ब्रिटिश भारत के तत्कालीन विदेश सचिव थे. वर्ष 1888 में हिमाचल प्रदेश के शिमला स्थित खूबसूरत अन्नाडेल मैदान में सर मॉर्टिमर डूरंड ने इस ऐतिहासिक टूर्नामेंट की नींव रखी थी. इसका प्राथमिक उद्देश्य सशस्त्र बलों और सैनिकों के बीच खेल भावना, अनुशासन और आपसी भाईचारे को बढ़ावा देना था.

एशिया का सबसे पुराना टूर्नामेंट
डूरंड कप एशिया का सबसे पुराना और विश्व स्तर पर तीसरे स्थान का सबसे प्राचीन फुटबॉल टूर्नामेंट है. शुरुआती दौर में इस प्रतियोगिता में केवल ब्रिटिश सेना की रेजिमेंटल टीमें ही भाग लिया करती थीं, लेकिन धीरे-धीरे समय के साथ जैसे-जैसे भारत में फुटबॉल की लोकप्रियता बढ़ी, यह टूर्नामेंट भी सैन्य सीमाओं से बाहर निकलकर भारतीय क्लबों और नागरिक टीमों का एक बड़ा महाकुंभ बन गया.

1925 और 1940: भारतीय क्लबों के लिए मील का पत्थर
डूरंड कप के 138 वर्षों के लंबे सफर में दो वर्ष बेहद ऐतिहासिक और बदलाव लाने वाले साबित हुए. वर्ष 1925 (मोहन बागान का ऐतिहासिक प्रवेश) 1925 में कोलकाता का प्रसिद्ध क्लब मोहन बागान डूरंड कप में भाग लेने वाला पहला भारतीय नागरिक क्लब बना. मोहन बागान ने प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन करते हुए कई मजबूत सैन्य टीमों को मात दी, हालांकि वे उस वर्ष खिताब हासिल नहीं कर सके, लेकिन उन्होंने यह साबित कर दिया कि भारतीय क्लब भी किसी से कम नहीं हैं.

वर्ष 1940 (मोहम्मडन स्पोर्टिंग की पहली ऐतिहासिक जीत)
डूरंड कप के इतिहास का सबसे स्वर्णिम अध्याय 1940 में दिल्ली के इरविन एम्फीथिएटर (अब नेशनल स्टेडियम) में लिखा गया.
फाइनल मुकाबले में मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब ने रॉयल वारविकशायर रेजिमेंट को 2-1 से हराकर नया इतिहास रचा. इस जीत के साथ ही मोहम्मडन स्पोर्टिंग डूरंड कप की ट्रॉफी उठाने वाला पहला भारतीय नागरिक क्लब बन गया. करीब एक लाख दर्शकों की अपार भीड़ के सामने मिली इस ऐतिहासिक जीत ने भारतीय फुटबॉल में एक नए युग का सूत्रपात किया. द्वितीय विश्व युद्ध, भारत की आजादी और देश के विभाजन जैसी कठिन परिस्थितियों और दौर के बावजूद भारतीय सशस्त्र बलों और खेल प्रेमियों के निरंतर प्रयासों से डूरंड कप का अस्तित्व और गरिमा हमेशा बनी रही.

एक शहर से निकलकर पूरे देश तक फैला डूरंड कप
हाल के वर्षों में आयोजकों ने डूरंड कप का दायरा काफी विस्तृत किया है. अब यह केवल दिल्ली या कोलकाता तक सीमित न रहकर देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में आयोजित किया जा रहा है। पूर्वोत्तर राज्यों के साथ-साथ अब झारखंड जैसे खेल-समृद्ध राज्यों में इसके मुकाबलों का आयोजन देश भर में फुटबॉल की नई पौध तैयार करने और नए दर्शकों को जोड़ने में मील का पत्थर साबित हो रहा है.

138 वर्षों बाद भी कायम है डूरंड कप की चमक
अपने 138 साल के लंबे और गौरवशाली सफर में डूरंड कप ने केवल चैंपियन ही पैदा नहीं किए, बल्कि भारतीय फुटबॉल की दशा और दिशा को भी संवारा है। बदलते दौर और परिस्थितियों के साथ खुद को ढालने की अद्भुत क्षमता ही इसे एक साधारण खेल प्रतियोगिता के बजाय भारतीय खेल इतिहास की जीवंत और ऐतिहासिक विरासत बनाती है. रांची में हो रहा यह आयोजन इस विरासत का एक और शानदार अध्याय है.

